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    क्या हक मांगे ऐ खुदा तू ही बता,
 ना ये जमीन अपनी ना आसमा,
 सब है तेरे सारा है तेरा जहान,
     तूने किया समस्त जगत का कल्याण,

    बनाई मानव जाति और बनाया इंसान,
  दिया इंसानों में नारी को दर्जा महान, 
     ना मिल पाया उसे हक ना मिला सम्मान,
         

समाज की वह सोचे,सोचे परिवार की,
हर कदम पर उसने किया, अपना फर्ज अदा,
        ना की कोई कदर, किसी ने उसके विचार की,

             रहती थी बेफिक्र कभी अपने ही ढंग में,      
       छोड़ चली अपना सब,सजाई मांग लाल रंग मे, बहन, बेटी, बहू बनी वो अर्धांगिनी,
       अस्तित्व हर किरदार में जैसे चमकती दामिनी,  
             

         दिलो जान से निभाती रही हर एक किरदार,
         सम्मान था उसका हक मांगती रही बार बार,
          अपने हक का सुखचैन वो देकर आज भी,
          मांगती रही सम्मान जो मिला ना आज भी,
    
            संगीता वर्मा✍✍