जीवन कितना बढ़ गया आगे, 
समय के संग हम बहुत हैं भागे 
माना मै हो गयी सयानी 
पर बचपन अब तक गया नही😋

शादी के कई बरस बीत गए 
लेकिन माँ के घर जाने पर
बच्ची बन जाती हूं अब भी
माना मै हो गयी सयानी 
पर बचपन अब भी गया नही😋

झटपट करती काम मैं घर के 
गोदी में सिर रख सासु माँ के 
बहू से बन जाती हूं बेटी 
माना मै हो गयी सयानी 
पर बचपन अब तक गया नही😋 

पतिदेव तो सीधे सादे प्राणी  
पर मै तो ठहरी चंचल नारी 
न छेडूं तो खाना पचता नही 
माना मै हो गयी सयानी  
पर बचपन अब तक गया नही😋 

बड़े हो रहे मेरे बच्चे  
वो भी मेरे दोस्त हैं अच्छे
हँसकर कहते मुझे यही
कि मम्मी हो गई सयानी
पर बचपन अब तक गया नहीं😋

दर्पण से मैंने पूछा जो
क्या छोड़ दूं मैं अपने बचपन को
तो वो बोला,"अरे ,नहीं-नहीं
चाहे हो जाओ सयानी
पर बचपन को छोड़ना नही😋
     

           –प्रीति ताम्रकार
              जबलपुर