8 साल की कोमल पापा का हाथ पकड़ कर साथ साथ चलती हुई, बाज़ार में घुमती हुई, नयी चीजो के देखकर जिज्ञासा से पूछती हुई की,

"पापा ये क्या है?"

बेटा ये सिलाई मशीन की दुकान हे यहाँ तरह तरह के कपडे बनते हे।

"और ये !? और ये!? और ये पापा!???"

उसके सारे प्रश्न का उत्तर देते हुए पापा बाज़ार से बहार रोड पर आगे बढे।

तो मेरी बिटुयाँ को चॉकलेट दिलाये?

"नहीं नहीं पापा, अपने ही कहा था दाँत खराब होते है, आप तो मुझे घुमाओ ।"

तो रानी बेटी बड़ी समझदार हो रही है। पापा मुस्काते हुए बोले।

कोमल भी हँसने लगी, उतने में ही एक मस्जिद दिखा, "पापा ये क्या हे ये दिखाओ ना।"
नहीं बेटा, ये अपने भगवान् नहीं हे। अपन को नहीं जाना चाहिए। अपने भगवान राम हे। 

छोटी सी कोमल के कोमल मन को ये उत्तर न सुहाया, " प्रतिप्रश्न करती हुई तो ये किसके भगवान् हे!?"

बेटा इन्हें मुसलमान लोग पूजते हे।

थोड़े आगे एक चर्च दिखा, "क्या पापा यहाँ चले !?"
नहीं बेटा ये चर्च में क्रिस्चन लोग जाते हे, अपन तो हिन्दू हे ये अपना मन्दिर नहीं है! 

आगे एक जैन मंदिर देख कर वही पापा का समजना बेटा इसमें जैन लोग जाते जो महावीर स्वामी को पूजते हे, अपने भगवान् तो राम, हनुमान , लक्ष्मण है। भारत मे विविध धर्म के लोग रहते है। जैन, हिन्दू, शिख, ईसाई, मुस्लिम जो अल्लाह को मानते है, सिंधी जो झूलेलाल जी को मानते है। कहाँ किसी धर्म की अविनय नही करना पर बस पूजना सिर्फ अपने भगवान को और श्रद्धान उन्ही पर करना।
"पर पापा भगवान के सामने से गुज़र ना पर देखते हुए भी सिर न झुकना ये अविनय ही तो हुई ना ! सोचो पडोशी के किसन चाचा अपन को रास्ते में मिले और अपन उनको देखते हुए भी जय श्री राम न करे उनकी विनय न करे तो यह उनकी अविनय हुई।" कोमल अपने मंतव्य को रखती हुई।
नहीं, बेटा यह सब तो अपने भाव पर निर्भर होता है, छोड़ो अभी तुम ये सब बातें, चलो मेरी चुलबुली बेटी को आइस क्रीम खिलाते है। बात को घुमाते हुए उसके पापा का फिरसे बच्चों की मनभावन चीज से ललचाना।
"नहीं पापा हमको शर्दी हो जाती है।" अभी भी वह असमंजस में है, सब सोचती हुई , तो ये भेदभाव क्यो और कैसे बने ये बाल मन से समझने की कोशिश करती हुई पापा का हाथ पकड़ चलती जा रही है।

कुछ दूर और आगे बढ़ते हुए साईं बाबा का मंदिर आता हे, "पापा ये किसका है?"
बेटा ये भी हिन्दू ओ का मंदिर है पर जो साईं बाबा को मानते हे वो यहाँ जाते है।

"पापा अभी तो आपने कहा था की अपन हिन्दू हे, तो फिर ये अपना मंदिर हुआ न?" 

हाँ बेटा! पर हिन्दू में भी ब्राह्मण, शिव, विष्णु आदि अनेक मत और पंथ है। 

"सबके भगवान् अलग अलग होते है क्या?!"

नहीं बेटा, भगवान् तो एक ही होते हे बस स्वरूप अलग अलग हे।

पापा की बातो को सुनकर आखिर उसके व्याकुल मन ने पूछा ही लिया "जब भगवान एक है फिर इतने मत और पंथ और बटवारा क्यू?"

उसके मासूम से प्रश्न में अपने ही धर्म के अस्तित्त्व पर श्रद्धान करवाते हुए उसके पापा भी कुछ पलो के लिए मौन!

✍🏻 *प्रियंका (पंखी)*🕊️😊