अपने अधरों पर मेरे गीत सजा लो सजनी।
मैं तुमसे प्रिय दूर कहां हूं!
पास बुला लो सजनी।
शब्दों के संदर्भों में प्यार की क्या परिभाषा है।
तुम केवल मेरी हो अंतिम क्षण तक आशा है।
अपने मन मंदिर में केवल, मुझे बसा लो सजनी।
गीत तुम्हीं मनमीत तुम्हीं, साज तुम्हीं आवाज तुम्हीं।
हो मोहन मंत्र तुम्हीं,
वंशी की,
मन वीणा की तार तुम्हीं।
अपने पायल नूपुर में,
मुझे सजा लो सजनी।
कस्तूरी मधुमास,महकते महुुए,जैसा यह है यौवन,
बड़ी बड़ी मृग नैनो में, खोया रहता क्यों पागल मन ।
अपने नैनो में काजल सा मुझे सजा लो सजनी। आओ अधरों पर मेरे गीत सजा लो सजनी।
स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय
गोरखपुर

0 टिप्पणियाँ