"हारने के बाद भी खड़ा होना चाहिए
संघर्ष जीवन में रुकना नहीं चाहिए"
गुरुशरण कौर 12वीं पास है,सब्जी बेचने वाले की तीसरी बेटी है सुशील है ,पाक कला में निपुण है, जिसकी शादी होती है । लेकिन उसके ससुराल वाले दहेज के लोभी होते । उसकी बेटी जब 4 साल की हो गई थी। तब वह तंग आ चुकी थी और एक दिन उसने बहुत बड़ा फैसला किया अलग होने का ।आसान तो नहीं था मगर उसने दिल पर पत्थर रखा। मां बाप ने समझाया क्या करोगी अकेली पर उसने कहा रोज तिल तिल के मरने से अच्छा है एक झटके में फैसला ले लूं । अकेले जीवन नहीं कटेगा मानजा। यूं ही कट जाएगा सफर जीवन का गुरुशरण के मुंह से निकला।
उसके ससुराल वाले कभी चीजों की मांग करते तो कभी पैसे की अपने पिता को किस मुंह से कहे? तीन तीन बेटियां ऊपर से इतनी गरीबी ।उसके सास-ससुर और उसका पति उसको मिलकर बहुत तंग करते हैं कभी खाना ना देते कभी बहाने मारकर उस पर कोई इल्जाम लगाकर उसकी पिटाई करते और अपमान तो ऐसा था कि वह तो सम्मान से जीना ही भूल गई थी। लेकिन उसके ससुराल वाले उसको उसकी बेटी को नहीं ले जाने दे रहे थे। कस्टडी अपने पास रखना चाहते थे और सबसे सॉलिड उनका बहाना था कि यह कुछ काम नहीं करती। इसके पिता की हैसियत नहीं के बच्ची का लालन-पालन ठीक से कर पाए।
लेकिन गुरु शरण हर हाल में अपनी बेटी को अपने साथ रखना चाहती थी।
फिर उसने लोक अदालत का दरवाजा खटखटाया और केस दर्ज करा दिया। 1 महीने का समय दिया के या तो नौकरी पकड़े नहीं तो फिर बेटी अपने पिता के साथ रहेगी।
गुरुशरण कौर नौकरी ढूंढती है पर उसे कहीं नहीं मिलती समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है और धीरे-धीरे उसका आखिरी दिन आ जाता है महीने का।
हार नहीं मानती लेकिन अंदर से काफी टूटी हुई थी उस दिन, वह एक रेस्टोरेंट्स पर जाती है जहां 8 साल का लड़का बैठा था पूछने पर बताता है कि पापा जी तो घर गए हैं आते ही होंगे पूछ लेना कोई काम है या नहीं दुकान पर।
यहां उसकी किस्मत उसका साथ दे देती है और उसे काम मिल जाता ।बहुत अच्छे से अपना काम संभालती हैं। साथ-साथ शादी पार्टी में खाना बनाने जाती है ।बेटी को अच्छी परवरिश देती है ।उसकी बेटी जिसका नाम उसने बड़े प्यार से मुस्कान रखा है।
उसके मुस्कुराने की इकलौती वजह है वह।
देखते देखते समय दौड़ने लगता है और उसकी बेटी अब 13 साल की हो चुकी है। मुस्कान बैडमिंटन बहुत अच्छा खेलती हैं। मुस्कान जिस स्कूल में पढ़ती हैं ।और बैडमिंटन के क्लासेज लेने के लिए किसी दूसरे स्कूल में शाम को जाया करती हैं।
यहां बस समय ठहरा था यह जीवन का सफर है इतनी आसानी से नहीं कटता। रोज-रोज कभी उसको काम कम मिलता है ,तो कभी शादियों के सीजन में पैसा ठीक-ठाक आता। गुरुशरणकोर बहुत ज्यादा परेशानियों से लड़ती हुई चल रही थी। लेकिन एक सम्मान का जीवन जी रही थी इसीकि उसको सबसे ज्यादा खुशी थी।
इधर मुस्कान अपने जीवन के उस मोड़ पर थी जहां वह किशोरावस्था में थी, खुश थी, पढ़ाई पर ,खेल पर ध्यान दे रही थी ।उसको तो लग रहा था कि उसका जीवन एकदम सीधा चल रहा है ।उसके जीवन का सफर कट रहा है लेकिन परेशानियां तो भी आनी थी।
एक लड़के ने चुपचाप से जब वह बैडमिंटन खेलने से पहले कपड़े बदला करते हो घर आते वक्त भी चेंज करते तो उसका एमएमएस बना लिया। फिर उसे लगा ब्लैकमेल करने। डर के कारण मुस्कान का अपने खेल , पढ़ाई से ध्यान हटता चला गया। स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा हुआ है। वह तनाव में रहने लगी और एक दिन उसने आत्महत्या करने की कोशिश की तो उसकी मां ने उसे बचा लिया और उसे समझाया मेरा क्या रह जाता तेरे बिना।
परेशान मुस्कान फफक- फफक कर रो पड़ी और उसने सब सच अपनी मां को बता दिया कि मां एक लड़का है और वह मुझे बहुत परेशान कर रहा था। जब मैंने उसकी बात नहीं मानी तो उसने यह तरीका अपनाया। मां कहती है कि मुझे उस से मिलवा मैं उसके घर वालों से बात करती हूं और यह वही रेस्टोरेंट के मालिक का बेटा था जिसके यहां मुस्कान की मां काम करती है तो वह जब मालिक और मालकिन से बात करने उनके घर जाती है तो वह लड़का सारा इल्जाम लड़की पर लगा देता है और मां-बाप भी उसका साथ देते हैं। क्या आपकी बेटी है ही ऐसी अब मां बेटी के पास कोई रास्ता नहीं रह जाताः पूरा समाज उन्हें दोनों मां बेटियों पर उंगली उठाने लग जाता है। फिर से एक बार अदालत में केस करती है। परेशानियां को फिर से उठाती है ।पुलिस भी उस मां बेटी को ही परेशान करती है। सारा समाज उसके खिलाफ है। झूठे सबूत हैं और वह हार जाती।
समाज का एक दूसरा रूप देखने को मिलता है जो बस्ती वाले उसे पिछले 13 साल से जानते थे। दुकान वाले मां बेटी की तारीफ करते नहीं थकते थे। एक झटके में अब वे दोनों बदचलन बन गई ।लेकिन गुरुशरण हार नहीं मानती हैं वह केस को हाईकोर्ट में डालती हैं। लेकिन एक एक्सीडेंट में अचानक मुस्कान मर जाती है।
लेकिन गुरु शरण जानती थी कि उसकी बेटी का एक्सीडेंट हुआ नहीं करवाया गया ।अंदर से टूट गई उसे लगा हार गई। मगर फिर उसने हिम्मत जुटाई बेटी की क्रियाकर्म के दिन पूरे हुए और उसने सोचा कि यह जीवन का सफर ऐसे तो नहीं कटेगा मरने के बाद भी मेरी बेटी तो बदचलन ही रही, मैं उस पर कोई ऐसा इल्जाम नहीं लगने दूंगी।
इस बार वे कोर्ट में नहीं सीधा मालिक के घर पर जाती हैं वहां चिल्ला चिल्ला कर उसके झूठे सबूतों पर दावा करती है और उसने गुस्से में है कि वह मालिक के लड़के पर हमला किया उसे मारा वह घायल हुआ और गुरुशरण भागने लगी। पुलिस मीडिया, आम जनता सब उसके पीछे पीछे हैं भागते हैं सब घर पहुंचते हैं और वह सारे मीडिया चैनल लाइव उसके घर के सामने खड़े हो गए ... 'यह गुस्से में लड़के को घायल करके भागी एक मां है'# ताजा खबर ब्रेकिंग न्यूज़ लाइव और न जाने क्या-क्या और तभी गुलशन दरवाजा खोलकर बाहर आती हैं उसके हाथ में होते हैं वह सर्टिफिकेट, मेडल जो उसके बेटी ने जीती थे। वह सारी मीडिया के सामने दिखाती हैं। एक एक पड़ोसी से जो उस वक्त खड़ा था,पूछती है बताओ मेरी बेटी कैसी थी? बताओ कब किस लड़के के साथ तुमने उसे गंदी हरकतें करते देखा? क्या तुम से कभी झगड़ा किया और रो-रोकर पूछते हैं कि दुनिया वालों कम से कम मरने के बाद तो उस पर कीचड़ मत उछालो। करुण पुकार सुन उस वक्त पड़ोसियों का जमीर जाग उठता है फिर वह सच्चाई कहते हैं मीडिया के सामने कि नहीं कभी हमने मां बेटियों को कोई गलत हरकत करते नहीं देखा और यह लाइव सब देख रहे होते हैं और मीडिया के प्रयास से सारा सच सबके सामने आता है और फिर से उस केस की सुनवाई कर फैसला मुस्कान के हक में दिया जाता है। फिर शुरू होता है प्रार्थना सभा, कैंडल मार्च लोग निकालने लगते हैं और उसकी मां से एक बार फिर मीडिया वाले मिलने आते हैं कि आपकी बेटी के सम्मान के लिए उसके हक के लिए देश कितना परेशान है सब कर रहे हैं और गुरुशरण कहती हैं- अगर यही लोग सही समय पर यह कदम उठा लेते ना तो आज इन सब की जरूरत नहीं होती...
और गुरु शरण एक बार फिर नौकरी ढूंढने निकलती है क्योंकि ऐसे बैठे हुए तो यह जीवन का सफर कटेगा नहीं।
किसी ने सच ही कहा है "यूं ही कट जाएगा सफर साथ चलने से कि मंजिल आएगी नजर साथ चलने से"पर साथ समय पर देना चाहिए।
वंदना शर्मा

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