"हर दीया के तले अंधेरा रहा
तुम ना आए कभी ना सवेरा हुआ
तुम ना आए ना आया संदेशा तेरा
तेरे आने से पहले ही मौत आ गई।
दर्दे दिल में उठी नीर आँखों से बहा,
मैं इंतजार में बैठी रही उम्र भर
रात रोती रही सो ना पाई कभी
आँसुओं से खुद को भिगोती रही।
सुबह, शाम तानों में ढलने लगी,
और दिन सिसकियों में गुजरने लगा
हर दिवाली में घर अंधीयारा रहा,
गम का दीपक हृदय में जलाती रही।
सारे रिश्ते ही झूठे हुए
जब से तुम ने मुंह मोड़ लिया
वक्त ने ठोकर मारी इस कदर,
जिंदगी में जैसे सुनामी भरी।
मैं गिरती गई फिर संभल ना सकी
जैसे कोई झरना गिरा हो ऊंची ढ़ाल से
बह गई मैं मौसम की धार बौछार सी
जा मिली मैं समुद्र की गहराई से।
पत्थरों से भरी राह में ठोकर लगी हर क़दम
फिर भी दामन को अपने बचाती रही
कभी परवाह ना की कब गिरी कब उठी
होश खोकर भी हर पल जीती रही।
फूल खिलने से पहले मुरझा गई
हर कदम सिर्फ काँटे मिले
बस हृदय को मेरे चुभोता रहा
बस दामन में मेरे तन्हाइयाँ भरी।।"


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