प्यार भरी जिन्दगी थी मेरी
शादी का बंधन तोर दिया
खुशी-पलायन की गद्दी पर
आपस में सबको प्रेम दिया
प्यार भरी जिन्दगी थी मेरी,फिर
क्यों कहलाई सौतेली माँ
अपना जीवन भूल गयी जब
बच्चों ने पुकारा माँ-माँ-माँ
सुख-दु:ख बाँटी,दुग्ध भी बाँटी
खून की एक-एक बूँदें तौल दिया
प्यार भरी जिन्दगी......
सौतेली की आवाजें सुनकर
आँखों की पानी कोर किया
मेरी ममता कौन जानता,फिर भी
सबको अपना नाम दिया
प्यार भरी जिन्दगी......
बुढ़ी शरीर भी ढ़ल गयीं अब
लपटें आग की ढ़ाल बनी
सीमट गई अब यादों की पोथी में
सौतेली की थी अब राह यहीं
प्यार भरी जिन्दगी......
लेखक:- विकास कुमार लाभ

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