एक रचना,
बीते वर्ष की तकलीफ,
के बाद,
एक उम्मीद
ईश्वर और,
नये वर्ष से!
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घनघोर निराशा,
ठहरा ठहरा सा,
वक्त!
वीरान सड़कें!
बच्चों की हंसी खुशी से,
वंचित, बंद पड़े स्कूल कॉलेज!
इंसान घरों में कैद!
किसी को अपनी आजीविका,
छिन जाने की चिंता!
कोई अपनों से दूर!
हालात भी ऐसे कि,
घर में रहकर ही,
खुद को बचा सकते!
हमने तो खुद को,
सुरक्षित कर लिया!
पर! याद आते हैं,
वो दिन कि.......
कैसे, अपने परिवार और,
बच्चों को बचाने के लिए!
तपती धूप में पैदल
दिल्ली, मुंबई से,
चले आ रहे थे!
कुछ लोग!
ये सब देख कर,
दिल बहुत रोता था!
रोटी कमाने घर से,
निकले लोग!
रोटी खा भी ना सके,
और........
रेल की पटरियों पर,
सिर्फ, खून और रोटी ही रोटी,
पसरी हुई थी!
हे ईश्वर!
क्या गुनाह था उनका??...
जो ऐसी मौत मिली,
उन्हें....
खैर, जो भी हो, बुरा वक्त था!
गुजर गया!
इक दूसरे की मदद से!
विश्वास से,
अपनों के साथ से!
हालात कुछ बेहतर हुये!
और बेहतरीन होने की,
उम्मीद के साथ!
अब तो, ईश्वर से,
यही प्रार्थना है,
कि......
हे प्रभु!
सदा अपनी, कृपा दृष्टि,
पूरी दुनियाँ पर,
बनाए रखना!
जो रास्ता सही हो,
उस पथ पर,
चलाए रखना!
🙏🙏🙏🙏🙏
🌹🌹🌹🌹🌹
श्वेता कर्ण!

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