सम्बल हैं, अभिमान हैं पिता....
बच्चों के सपनों की उड़ान हैं, पिता....
बैठा कर जब काँधे पर घुमाते हैं मेले,
लगते मुकम्मल जहान हैं पिता.....!
मार्गदर्शक, जीवन की नई दिशा हैं, पिता.....
सच्चाई, मेहनत, लक्ष्य पर डटे ,
रहने की सीख हैं, पिता....
घोसलें बनाने को मजबूत दरख़्त हैं, पिता....!
चिलचिलाती धूप में घनी छाया हैं, पिता....,
ईट पत्थर, से बने मकानों को,
घर बनाते हैं पिता!
सुबह निकलते कामों पर पैसे की खातिर,
सच कहूँ, परिवार की खुशियों पर,कुर्बान हैं पिता....!
बच्चों की आँखों में चमकती अरमान हैं पिता.....,
माँ की चूड़ी, श्रृंगार, चेहरे,
की रौनक हैं पिता...
हरे भरे फलदार वृक्ष में जड़ के समान हैं पिता....!
कितना भी कहूँ कम ही होगा, बस,
इतना कहती हूँ कि,
पैरों तले की जमीन और,
सर के ऊपर आसमान हैं पिता.....!
श्वेता कर्ण!

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