हर कोई चाहता है जीवन में
छाए रहें इंद्र धनुष से सतरंगी रंग,
पर इनका आनन्द तभी है जब,
हो सब अपने संग।
पल पल बदलती जीवन की गति,
कभी अवनति कभी उन्नति,
जीवन उसका ही सतरंगी जो दोनों में रहे सम।
जब सुख को हमने जिया है,
हर पल का रस लिया है,
तो क्यों न दुख को भी जिएं समझ एक आनन्द।
आए वेदना तो उसे हँसकर सह,
वो ही तो सिखाएगी परिस्थितियों पर फतह,
हर पल को जी क्या पसन्द क्या न पसन्द।
इतना तप कुंदन बन जाए,
सप्त रंगों से भी सुनहरी आभा पाए,
मन भी कर सरावोर ,कर ले अंग अंग।
इंद्र धनुष बनके कुछ पल न बिखेर रंग,
इंद्र धनुष से कर ले जीवन के सारे पल,
मन को कर दे हर सुख दुख में स्वछंद।
कभी न उतरेगा ऐसा तेरी प्रीत का सार,
तेरे नाम की ओड़ी चूनर धानी हो गए हम तो ,
कोई भी फर्क न पड़या मन हुआ मस्त मलंग।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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