"जब भी लगती जोरों की भूख,
माँ दौड़ कर जाती रोटी बनाने।
जब भी मैं थाली आगे करती,
माँ औरों की थाली में रोटी रखती।
कुछ तो साज़िश ख़ुदा तेरी भी होगी।
हमने कहा हमें आगे है पढ़ना,
माँ के लिए भी है कुछ करना।
सबने हमारे हाथों में मेहंदी रचा दी
शादी करा मुझे दुल्हन बना दी।
कुछ तो साज़िश खुदा तेरी भी होगी।
खिल गए मन में खुशियों के फूल।
सजने लगे मन में साजन के सपने।
तभी ठोकर मारी कुदरत ने अपनी।
पल भर में मुझे अभागन बना दी।
कुछ तो साज़िश खुदा तेरी भी होगी।।
फिकी नहीं हुई थी मेंहदी की लाली।
ना की हमने साजन से दिल की बातें।
ना मैंने उनको, देखा नज़र भर।
तुम ने मेरी माँगों से सिंदूर मिटा दी।
कुछ तो साजिश खुदा तेरी भी होगी।।
कल तक थी मैं, बैटी किसी की,
ना कि अपने जीवन की कोई सपने पूरे,
ना देखा दुनिया को, अपनी नजर से,
आज पुरे समाज की जिम्मेदारी बना दी।
कुछ तो साजिश खुदा तेरी भी होगी।।
ना थी मेरी गलती, ना शिकायत तुम से,
देखा इस जहाँ को, दुनिया की नजर से।
ठोकर लगी फिर भी उफ ना करी मैं,
मंजिल मिलने से पहले तुम ने साथ छोड़ा।
कुछ तो साजिश खुदा तेरी भी होगी।।"
अम्बिका झा ✍️

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