8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष में आज अगली कड़ी में हम बात करेंगे शबरी की

मां शबरी

सबरी देखे बाट, राम मेरे आजाओ...
बाट या इंतजार जब कभी उदाहरण देता है इंसान तो याद आती है शबरी की।
सही भी है जितना इंतजार  शबरी ने किया राम जी के लिए ना कोई कर सकेगा।

शबरी एक आदिवासी इलाके की छोटी सी कन्या थी। उसे विवाह का अर्थ भी नहीं पता था लेकिन वहां परंपरा थी के बकरे की बलि दी जाती थी विवाह में, जब शबरी ने अपने छोटे से मैमने को देखा और उसने सोचा अगर मेरा विवाह हुआ तो इसकी बलि दी जाएगी और वह वहां से भाग खड़ी हुई इतनी छोटी बच्ची के मन में इतनी करुणा थी।
जैसे जोहरी को परख होती है हीरे की वैसे ही ऋषि मतंग ने शबरी के भीतरी गुणों को परखा।
और ऋषि मतंग ने कहा बेटी शबरी इंतजार करना है एक दिन श्री राम स्वयं तुमसे मिलने आएंगे।

अपने गुरु के वचनों पर विश्वास किया शबरी ने दिन-रात राम राम रटते हुए श्री राम का इंतजार किया।

वह हर रोज आश्रम का रास्ता साफ करती, फूलों से सजा देती।  श्री राम नहीं आए तो अगले दिन सोचती अरे! मैंने पीछे का रास्ता तो साफ किया ही नहीं, कभी सोचती दूसरे रास्ते से तो नहीं आएंगे। एक भी दिन उदास नहीं हुई, हर रोज एक नई उम्मीद के साथ खड़ी होती और देखते- देखते कब बूढ़ी हो गई उसे भी नहीं पता चला लेकिन एक दिन श्री राम भगवान स्वयं सबरी से मिलने आए। मां का दर्जा दिया। उनके हाथ से चार झूठे बेर खा कर धर्म ,अर्थ, काम, मोक्ष सभी का ज्ञान दिया। भक्ति प्रदान की और मां शबरी इतिहास में अमर हो गई।

मां शबरी के जीवन से हमें शिक्षा लेनी होगी कि जब तक लक्ष्य पूरा ना हो हमें ना हारना है, ना थकना है, ना उम्मीद छोड़नी है बस उस काम को करते जाएं जब तक वह पूरा ना हो।
और जैसे ही शबरी का विश्वास अपने गुरु के वचनों पर था इसी तरह हम भी अपने गुरु के वचनों को निभाए

अटूट श्रद्धा और विश्वास का नाम शबरी है
#अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं

वंदना शर्मा