यादों ने यादों से कहा
लौट के चल उस याद में
आ लौटे फिर उस दिन में
उस अलबेली रात में
तेरे प्रेम निवेदन को जब
मैंने सहज स्वीकारा था
जब तेज़ हुई दोनो की धड़कन
मन को ले चल उस याद में
आ लौटे फिर उस दिन में
उस अलबेली रात में
धीरे धीरे, हौले हौले
प्रीत हमारा बढ़ने लगा
छुप छुप कर मिलते थे दोनो
कैसे कैसे बहाने थे
आज भी, आज से भी ज्यादा
आता हैं मज़ा उस याद में
आ लौटे फिर उस दिन में
उस अलबेली रात में
मैं औऱ तुम जब हम हुए
उस मंडप गोधुली बेला में
दोनो के दिल एक हुए
लोगो से भरी उस मेला में
शुभ आशीष मिला सबका हमको
जीवन धन्य हुआ उस याद में
आ लौटे फिर उस दिन में
उस अलबेली रात में
चूड़ी कंगन नथ ओर बिंदी
पहन मेरा श्रृंगार हुआ
फिर प्रणय सेज पर सबकुछ अपना
मैंने तुझ पर वार दिया
चल उस याद में मेरे साजन
उस मिलन की रात में
आ लौटे फिर उस दिन में
उस अलबेली रात में
यादों ने यादो से कहा
लौट के चल उस याद में
आ लौटे फिर उस दिन में
उस अलबेली रात में
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थ्रीमा विनोद साहू

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