वो प्रेम ही तो है
जो मुझे अपनी आँखें खोलते ही
आपसे हो गया था। 
मोहब्बत की दास्तां 
अब क्या बयाँ करु मैं अपनी। 
शून्य सा जो लगता है
ये मेरा जीना आपके बिन। 
काम के मोह मे फँसी 
इस मतलबी दुनिया में
एक तु ही तो हिम्मत है मेरी। 
रूचि भी नहीं होती है
अब पकवान खाने की। 
प्रेमभाव से खिलाने को
अब तुम जो नहीं होती हो। 
वफा ही कहाँ कर पाती है
बाजार के खाने की खुशबू भी। 
पसंद तो नहीं था मुझे
हर सुबह स्कूल जाना। 
चाह बस इतनी सी थी
कि तुम्हारी गोद में सोइ रहूँ। 
स्नेह से जब तुम मेरी
चोटी बनाया करती थी
सम्मोह भरी नजरों से मैं
आईने मे तुम्हे हि तो देखा करती थी। 
इश्क़ के नाम तो कई है
पर माँ से बढ़ कर कहा कोई हैं। 
प्रीत मेरे मन की
तुमसे बढ़ कर कौन जानता है। 
वात्सल्य ही तो है
जो तुम्हे रास आता हैं। 
सुभगत भरी निगाहें मेरी
हर पल तुम्हे ही ढूंढती हैं। 
प्यार तो मेरी पहले तुम हो
बाकी दुनिया तो बस कागजी हैं। 
प्रियतमा कैसे ना कहु मैं तुम्हे
जीने की मकसद तो तुम ही हो ।




                  रिया बांका