सोच रहा था मेरा मन, 
             सरिता में ना कोई दलदल हैं।
पाहन से टकराती आती, 
             उद्वेग लहरों में हलचल हैं।
बह रही है निर्मलता से, 
             ध्वनियों में वर्ण कलकल है।
रजत द्युति सी दिखती, 
             मृदुलता में वसन मलमल है।

विलय विष की व्यापकता, 
             सारंग नहीं है अब ये हाला।
भृकुटी चढ़ी दृश्य निहारे, 
             प्रभाव है वारुणी का प्याला।
सुप्त अवस्था चेतन का, 
             बंद नयन में छाये निरदमाला।
अतुल्य उपमा है इनके, 
             निरंतर बहती रहती जयमाला।



                     सतेश देव पाण्डेय