रंजना अपने घर की छत से सङक पार कब्रिस्तान को एकटक निहार रही थी। अनेकों कब्रें सामने बिछी दिखतीं। इनमें कौन राजा है और कौन रंक, फर्क भी करना मुश्किल है। रईसों का जनाजा बङे शान से निकलता। बहुत भीङ होती। गरीबों के लिये चार छह लोग ही इकट्ठे हो पाते। पर कुछ महीनों के बाद सभी की एक सी हालत दिखती। गरीबों के बच्चे तो कभी कभी बुजुर्गों की कब्र पर आ जाते। पर रईसों की औलादों के पास शायद इतना भी समय न होता। बक्त के साथ सभी की हालत एक जैसी दिखने लगती। 

   रंजना  एक विद्यालय में चपरासी का काम करती थी। अकेली बेटी के पालन के लिये चपरासी का काम करना हर किसी को अचरज में डाल देता जबकि उसके पास पर्याप्त संपत्ति थी। । ऊपर से कब्रिस्तान के सामने सस्ता बिक रहे मकान को खरीदने का रहस्य कोई न समझ पाया । भला कौन कब्रिस्तान के सामने घर बनाता है। पर असल बात कुछ और थी। रंजना को कब्रों से लगाव हो गया। कब्रिस्तान को अपनी आंखों के सामने देखकर उसे अजीब आनंद मिलता। वैसे उसके शुभचिंतकों ने उसे कब्रिस्तान के सामने मकान लेने से रोका था। कहा जाता है कि जो कब्रिस्तान के नजदीक रहता है, उसे जीवन में सुख नहीं मिलता। कब्रों में सो रही रूहें कई बार बाहर घूमने आ जाती हैं। पर रंजना को लगता कि वह तो बचपन से ही कब्रिस्तान में रहती आयी है। न जाने कितनी कब्रों से उसकी पहचान थी। हर एक कब्र को अच्छे से ध्यान रखती। आज कब्रिस्तान को देखते देखते रंजना को अपनी परिचित कब्र याद आने लगीं। 

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   " दिनभर बैठी बैठी क्या करती रहती हो। लङकी को कुछ तमीज सिखाओ। बङे होकर इसे पराये घर जाना हैं। पराया धन है। आज घी लगी रोटी मांग रही है। कल दूध मांगेगी। चटोरी बन जायेगी। ससुराल में हमारी नाक कटबायेगी।" 

   रंजना के पिता रामनारायण की समाज में बहुत धाक थी। पर पुराने गले सङे विचारों से वह खुद को कभी पृथक नहीं कर पाये। उनकी नजर में लङका और लङकी के मध्य स्पष्ट भेद था। लङका जहाँ कुलदीपक था, वहीं लङकी पराया धन। जिसे एक दिन पराये घर जाना हैं। ठीक है कि स्त्री की ही इतनी सामर्थ्य है कि वह दूसरे घर को भी अपना बना लेती है। पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि बेटी की परवरिश में भी भेदभाव किया जाये। पर रामनारायण की नजर में बेटियां हमेशा पिता पर बोझ होती हैं। उनकी शादी में अच्छा खासा खर्च होता है। इसलिये रंजना के जन्म के बख्त भी खुशियां नहीं मनायी गयीं थीं। भविष्य के लिये धन बचाने की चिंता में एक अबोध लङकी पालन पोषण में भी कंजूसी झेल रही थी। 

    " क्यों। तूने घी लगी रोटी क्यों उठाई। बताया न कि ये रोटियां भैय्या के लिये हैं। तेरे लिये ये रूखी रोटी हैं।" माॅ का स्वर पिता से ज्यादा भी उग्र था। 

  " पर माॅ। एक ही तो खाई है। आखिर मुझे क्यों घी लगी रोटी नहीं देती हो।" 

   रंजना का प्रतिवाद करना माॅ को ज्यादा अखरा। रंजना की क्यों का सही उत्तर माॅ के पास न था। पर माॅ के थप्पङों में वह ताकत थी कि रंजना को इस तरह के प्रश्न भविष्य में पूछने से रोक सके। न जाने कितने थप्पङ रंजना को लगे। माॅ थोङा रुकी। पर फिर एक चिंता हुई कि शायद लङकी फिर से जिद न करने लगे। पुरी व्यवस्था एक बार में होनी चाहिये। माॅ उसका हाथ एक हाथ में पकङकर और दूसरे हाथ में एक लकङी लेकर कमरे में चली गयी। फिर बहुत देर तक रंजना के रोने और चीखने की आबाजें कमरे के बाहर आती रहीं। पर न तो पिता ने और न किसी अन्य ने उसे बचाने की कोशिश की। आखिर रंजना के अच्छा खाने पीने और भाई से बराबरी करने की इच्छा उसी दिन मर गयीं। फिर कभी रंजना ने भाई से बराबरी करने की बात नहीं की। जो मिल गया, चुप खा लिया। पर सच्चाई यह थी कि रंजना की मरी हुई ख्वाहिशें अक्सर कब्र से निकलकर बाहर घूमतीं। रंजना उन्हें नजरंदाज करती। पर हमेशा सामने आ जातीं। रंजना चीखकर कहती - "क्यों मेरा पीछा कर रही हो। मर कर भी तुम्हें चैन नहीं। अब मुझे शांति से रहने दो। चुपचाप अपनी कब्र में सो जाओ।" 

  और सचमुच रूह एक आज्ञाकारी बच्ची की तरह कब्र में सो जाती। पर बच्चे और रूह का क्या भरोसा। कई बार जिद करके रंजना के सामने आ जातीं। उसे हौसला देती। 

  " घबराओ मत रंजना। तुम शानदार हो। सबसे अलग हो। कुछ भी कर दिखा सकती हो। "

   रंजना को ये बातें अच्छी तो लगतीं। पर उसे भ्रम में जीना पसंद नहीं था। लङकी की हैसियत वह जानती थी। फिर रंजना की फटकार और रूह छिप जाती अपनी कब्र के भीतर। यह बहुत दिनों चलता रहा। जब तक कि रंजना कौमार्य की दहलीज तक न पहुंच गयी। अब रंजना निश्चिंत थी। कब्र में बंद रूह अब कई दिनों से नहीं आयी। पर यह तो तूफ़ान से पूर्व की शांति थी। रंजना के जीवन में अभी ऐसी कितनी कब्र मिलेंगीं। या यह कहो कि उसका सारा जीवन ही एक कब्रिस्तान बनने जा रहा था। 
...............
गांव में ही एक हाईस्कूल था। रंजना का विद्यालय जाना इस बात पर निर्भर करता था कि घर का काम हुआ या नहीं। वैसे भी लङकी को पढाने लिखाने से क्या फायदा। आखिर में चौका चूल्हा ही करना है। तो घरेलू शिक्षा ज्यादा जरूरी है। रंजना को घरेलू शिक्षा देने में उसकी माँ सावित्री एकदम सही भूमिका निभा रही थी। रंजना खाना बनाने, बर्तन मांजने, घर साफ करने से लेकर सारे काम करती। पर उसकी हर छोटी छोटी गलती पकङी जाती। सब्जी में नमक कम है, मिर्च ज्यादा डाल दी। कैसी सफाई की है, इधर जाला जला है, कहाॅ दिमाग रहता है तुम्हारा, कभी किताब एक तरफ रखकर दिमाग से काम किया कर, ये सारे वाक्य रंजना को रोज सुनने को मिलते। अब तो पिता रामनारायण के साथ साथ छोटा भाई सोहन भी रंजना की कमियां गिनाता। हर तीन चार दिन बाद माँ से पिटाई हो जाती। पर इन सबसे अलग रंजना को न जाने कौन सा पढाई का भूत चढा हुआ था। दिन भर घर का काम करती और रात में पढती। हालांकि रंजना के पास पूरी किताबें भी न थीं। उसकी सहेलियाँ विद्यालय के साथ साथ ट्यूशन भी ले रहीं थीं। पर रंजना को स्कूल रोज जा पाना भी मुश्किल होता। अब तो सावित्री जी को घर का काम करने में दिक्कत होती। आखिर जब काम करने के लिये लङकी सक्षम है तो माँ को तो काम करने में दिक्कत आयेगी ही। 

   रंजना की हाईस्कूल की परीक्षा चल रही थीं। शायद यह रंजना की आखरी परीक्षा थी। अब गांव से बाहर लङकी को भेजने का कोई औचित्य न था। पर रामनारायण थोङे ज्यादा समझदार थे। सावित्री को उन्होंने अपनी मन की बात बताई। अब सावित्री रंजना को कुछ ज्यादा ही काम बता रही थी। अगर लङकी हाईस्कूल में फेल हो जाये तो फिर काम बन जायेगा। अच्छा बहाना मिल जायेगा कि लङकी का पढाई में ध्यान ही नहीं है। फिर नाहक क्यों पैसे बर्बाद किये जायें। हालांकि रंजना का छोटा भाई सोहन कक्षा ८ में फेल हो चुका था। पर इस साल उसे शहर के एक विद्यालय में दाखिला दिला दिया। विद्यालय आवासीय था। फिर अलग से ट्यूशन भी लगवा दिया था। पर वह तो लङका है। 

   हाईस्कूल की परीक्षा का परिणाम आया। रंजना ने न केवल अपने विद्यालय में प्रथम स्थान पाया अपितु जिले में भी टापर रही। मैरिट लिस्ट में भी कोई स्थान आया। अखबार बालों की भीङ रंजना के घर पर खङी थी। रामनारायण मौके की नजाकत समझते थे। लङकी की मेहनत की जी भर कर तारीफ उन्होंने की। कई समाज सेवी संस्थाओं ने रंजना को उपहार दिये। इनाम की राशि किस तरह प्रयोग होनी है, इसपर घर में थोड़ा विवाद था। रामनारायण कुछ पैसे और मिलाकर एक स्कूटर लेना चाहते थे। पर सावित्री देवी की जिद सोने की नथ बनाने की थी। आखिर सावित्री जी की जिद पूरी हुई। नई नथ पहनकर पूरे मोहल्ले में घूम आयीं। आखिर बेशर्म लोग जितनी बेशर्मी पर उतर सकते हैं, उसकी क्या गिनती। 

  पर कुछ ऐसा हो गया जिसकी उम्मीद न तो रामनारायण को थी और न सावित्री जी को थी। कोई प्राइवेट आवासीय विद्यालय किसी लङकी को मुफ्त में दाखिला क्यों देगा। सरोजनी आवासीय विद्यालय का दूर दूर तक नाम था। फीस तो ज्यादा न थी पर दाखिला आसान न था। होशियार बच्चों को तलाशकर उनका भविष्य बनाते। बच्चे अगर गरीब भी हों पर होशियार हों तो भी सरोजनी विद्यालय उन्हें प्रवेश दे देता था। कह सकते हैं कि निर्धन और होनहार बच्चों को शिक्षा दिलाना ही संस्था का ध्येय था। अब प्रत्यक्ष में रामनारायण जी लङकी को पढाने में मना नहीं कर सकते थे। रंजना के मन में पढाई की नयी आस जग गयी। हाईस्कूल के बाद घर बैठने जा रही रंजना का दाखिला एक बहुत बङे विद्यालय में हो गया। न पढाई का खर्च और न रहने खाने का खर्च। 

   " सुनिये जी। यह सब क्या कर रहे हैं। लङकी को शहर भेजने की क्या जरूरत है। घर का काम कौन करेगा। लङकी ज्यादा पढ गयी तो ब्याह में और ज्यादा दिक्कत आयेगी। ज्यादा पढा लिखा लङका देखना होगा। ज्यादा पैसे खर्च होंगें। कुछ करो।" 

   सावित्री की विचारधारा रामनारायण से एक कदम और आगे थी। पर रामनारायण व्यावहारिक आदमी थे। लङकी को न भेजने से बात बिगङ सकती है। लोग पिछङी विचार धारा का कहेंगें। हालांकि किसी के कहने से उन्हें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। पर उनके मन में अलग लोभ था। अगर लङकी अच्छे नम्बरों से पास हो गयी तो फिर से इनाम मिलेगा। रामनारायण को भी फायदा होगा। मन की बात सावित्री को बोल दी। पर सावित्री उससे ज्यादा समझदार थी जितना रामनारायण उसे समझते थे। 

   " वाह अक्ल के दुश्मन। इनाम के लिये लङकी को पढाओंगे ।पहले तो कोई जरूरी नहीं कि इंटर में भी लङकी को इनाम मिले। दूसरा इंटर करके फिर कौन सा लङकी चुप बैठ जायेगी। आगे पढने की बात कहेगी। शहर में अकेले रहकर हाथ से भी निकल जायेगी। फिर बस पढाते रहो लङकी को। मेरी मानो तो जल्द से जल्द लङका देखकर बोझ हल्का करो। इसी में समझदारी है। गुप्ता जी की लङकी पच्चीस की हो गयी। अब शादी कर रहे हैं तो भी कौन सा मुफ्त में हो रही है। "
    पत्नी के ज्ञान से रामनारायण की आंखेंं खुल गयीं। सावित्री की हर बात उन्हें बृह्म ज्ञान लगने लगी। थोङा झिझककर बोले -" इतना तो मेने सोचा ही नहीं था। पर अगर लङकी को पढाने न भेजूं तो फिर बात बिगड़ जायेगी। अभी तो अखबार बालों को इतना लंबा चोङा कहा है। "

    " मैं कब कहती हूं कि लङकी को मत भेजो ।पर जरा समझदारी दिखाओ। चार छह महीने में कोई बात बनाकर लङकी को वापस ले आना। ईश्वर अनेकों बहाने देता है। समझदार आदमी को तो अपने मन का करने के लिये मौके पहचानने की कला आनी चाहिये। "

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    शहर के विद्यालय में रंजना को बहुत सम्मान मिला। पढाई में तो वैसे भी बहुत अब्बल थी। अध्यापकों और साथियों के प्रोत्साहन से उसकी छुपी प्रतिभाएं भी बाहर आने लगीं। पहले डरी सहमी रहने बाली रंजना अब आत्मविश्वास से भरी हुई थी। विद्यालय में हुई वाद विवाद प्रतियोगिता में भी उसने गजब का कोशल दिखाया। विद्यालय का हर छात्र, छात्रा रंजना को जानता था। 

    भूमि रंजना की रूममेट थी। बहुत सीधी और पढाई से मतलब रखने बाली लङकी थी। पर उसे किसी से भी बात करने में कोई झिझक नहीं थी। उसके पिता ज्यादा पैसे बाले तो न थे पर विचारों में बहुत बढकर थे। उसके और उसके भाई के मध्य कोई भेदभाव न था। दोनों को समान मौके मिलते। छात्रावास में रह रही लङकी को हर दस, पंद्रह दिन बाद पिता देखने आते। लङकी की पसंद की चीजें उसकी माँ भेजती। रंजना के लिये यह एक आश्चर्य से कम न था। 

    भूमि कक्षा के लङकों से भी बात करती थी। लङकों से मिलकर रहना कोई गलत बात नहीं है। भावनाएं ठीक होनी चाहिये। संगति का कुछ तो असर होता है। खरबूजे को देखकर खरबूजा भी रंग बदलता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। बचपन से बंदिशों में रहती आयी रंजना को खुलने में थोड़ा समय तो लगा। पर एक बार खुलने के बाद उसका आत्मविश्वास बहुत बढ गया। उसके मित्रों की सूची में लङकियों के साथ साथ लङके भी थे। पर रंजना और भूमि की मित्रता अच्छे, सदाचारी और पढने में अब्बल लङकों से ही थी। 

   राकेश का जन्मदिन था। वैसे सभी बच्चे छात्रावास में ही रहते थे पर आज राकेश का मन अपने साथियों को पार्टी देने का था। पार्टी का मतलब बहुत खर्चा करना ही नहीं है। बाजार में कुछ चांट पकोड़े अपने मित्रों को खिलाने में भी मन में बहुत खुशी होती है। आज भूमि के साथ रंजना भी बाजार निकल आयी। बाजार में एक चांट की दुकान पर सभी चांट खा रहे थे। 

    " हैप्पी बर्थ डे राकेश। भगवान तुम्हें खूब खुशियां दे।" भूमि के साथ साथ रंजना ने भी राकेश को बधाई दे दी। आज रंजना ने भी राकेश से हाथ मिलाया। जिंदगी में उसने पहली बार किसी लङके को हाथ मिलाया। 

   " हमें भी हाथ मिला तो जानम। आखिर हम भी तो आपके चाहने बाले हैं। हाथ तो क्या, हम तो गले भी मिल सकते हैं। "

   पीछे से कुछ बत्तमीज टाइप लङके हस रहे थे। पलटकर देखा तो बस आठ या नौ में पढने बाले लङके थे। जरा जरा से लङके आवारागर्दी करते फिर रहे हैं। पढने की जगह लङकियों को छेड़ रहे हैं। वैसे राकेश और दूसरे लङके उन्हें पीटकर ठीक कर सकते थे। पर पढाई में ध्यान लगाने बाले बच्चे हमेशा झगड़े से दूर रहना चाहते हैं। 

   सब बच्चे वापस अपने विद्यालय के छात्रावास में आ गये। शेष सभी तो इस बाकये को भूल गये पर रंजना नहीं भूल पायी। रात भर उसे नींद नहीं आयी। सच्ची बात है कि जिस लङकी का छोटा भाई शहर में पढाई की जगह आवारागर्दी करता फिर रहा है, उसे कैसे नींद आयेगी। छोटे भाई का नैतिक पतन रंजना साक्षात देख चुकी थी। यह दूसरी बात है कि सोहन ने पीछे से अपनी बहन को पहचाना नहीं था। पर रंजना को देखकर झिझक गया। रंजना भी ऐसी स्थिति में चुपचाप विद्यालय आ गयी। अगर अपने मित्रों के सामने उससे कुछ कहती तो शायद उसी का सम्मान नष्ट होता। पर पिता जी और माॅ को बताना जरूरी है। अभी तो समय है। फिर सर पीटने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचेगा। सही कहा है कि आत्मविश्वास से भरपूर व्यक्ति अपना अतीत भूल जाता है। रंजना का यह सोचना कि उसकी बात पर उसके माता-पिता विश्वास करेंगे, वास्तव में आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि अति विश्वास था जो जल्द ही टूटने बाला था।
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रंजना अभी घर जाकर सोहन की हरकत बता भी नहीं पायी थी कि उससे पहले सोहन घर पहुंच गया। वैसे भी रंजना की किसे परवाह थी। हास्टल से महीनों घर नहीं पहुंच पाती थी। पर पिता कभी भी उसे देखने नहीं आये। ऐसी बात नहीं है कि वह शहर आते न हों। हर दस पंद्रह दिन बाद शहर घूमने आते थे। गांव के बाजार से सारी आवश्यकता पूरी न होती। तो शहर का रुख करना होता। लङके सोहन को मिलते। सावित्री भी लङके के लिये उसकी पसंद के व्यंजन बनाकर भेजती। फिर खुले हाथों से सोहन को जेबखर्च दिया जाता। पर लङकी की भी कुछ जरूरत हो सकती है, इस तरफ कभी किसी का ध्यान न जाता। लङकी का क्या है। वैसे भी लङके पाले जाते हैं। लङकियां तो पल जाती हैं। हमेशा गुलाब को खाद पानी दिया जाता है। खरपतवार व जंगली पोधे यों ही उपज जाते हैं। यह तो सृष्टि का नियम है। फिर लङकी मुफ्त में हास्टल में रह रही है। जेबखर्च देने पर वह बिगङ जायेगी। लङकी के बिगङ जाने पर दुनिया में नाक कट जायेगी। जैसे माता पिता की सारी नाक लङकियां ही काटती हैं। लङकों के गलत आचरण से उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आयेगी।

  अभी कुछ दिन पहले तो लङके को मिलकर आये थे। अचानक कैसे आ गया। कोई परेशानी की बात है। रामनारायण व सावित्री को बङी चिंता थी। आखिर लङके की चिंता तो करनी होती है। पर लङका भी माता पिता के पदचिन्हों पर चल रहा था। जो बचपन से देखता आया था, वह सब उसके रक्त में मिल चुके थे। जरा से लङके को बङी बहन के बिगड़ने की चिंता थी। आखिर वह  कुल का चिराग था। उसकी बहन के कारण कुल पर जो दाग लग सकता है, उसकी चिंता में भागा भागा गांव आया है। पर लङकियों को छेङने से कुल को दाग नहीं लगता। वैसे भी गांव में किसी ने देखा नहीं है। अगर देखा है तो रंजना ने। और रंजना को पूछता कौन है। सोहन की बुद्धि वास्तव में ज्यादा व्यावहारिक थी। 

    " पापा। आपको पता भी है, रंजना दीदी शहर में क्या गुल खिला रही हैं। मुझे पहले मेरे दोस्तों ने बताया। मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ। पर जब अपनी आंखों से देख लिया तो फिर यकीन करना पङा। लङकों के साथ बीच बाजार हंसी ठिठोली करना, उनसे हाथ मिलाना, कौन शरीफ लङकियों के काम होते हैं। शहर में लङकियों को कोई इज्जत बेइज्जती की परवाह तो होती नहीं है। खुद सज धजकर पढने जाती हैं जैसे कि कोई सौंदर्य प्रतियोगिता में जा रही हों। फिर बबाल करती हैं कि लङके छेङ रहे हैं। आखिर दीदी को बाजार में लङकों के साथ घूमने की जरूरत ही क्या है। ऊपर से ऐसी बेशर्माई कि मुझे देखकर भी कोई झिझक नहीं। अपने दोस्तों के साथ ही वापस गयी। "

   लङके से खबर सुनकर रामनारायण सर पकङकर बैठ गये। सावित्री रोने चिल्लाने लगी। 

  " इसी लिये मना कर रही थी। मत भेजो लङकी को पढाने ।पर मेरी सुनता कौन है। लङकी को कलेक्टर बनाना है। अभी पांच महीने आजादी मिली है कि देखो यह हाल है। ज्यादा छूट दी तो देख लेना, किसी दिन खानदान को कालिख पोत किसी के साथ भाग जायेगी। समाज में हमारी क्या इज्जत रह जायेगी। "

  रामनारायण भी इन्हीं बातों की चिंता में डूबे थे। लोगों की बातों में आकर नाहक गलत कदम उठा लिया। पर सावित्री के शोर शराबे के वह खिलाफ थे। अभी बात घर के भीतर है। नाहक बाहर जायेगी। ज्यादा बदनामी होगी। फिर किसी एक के कान में कोई बात रुकती थोङे है। एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे तक पहुंचती रहती है। हर बार थोङा इजाफा ही होगा। फिर शादी में भी दिक्कत आयेगी। जिस बोझ को बेबजह अपने कंधे पर रखे हैं, वह हमेशा के लिये कंधों पर बना रहेगा। 

   " अब शोर शराबा कर दुनिया को खबर मत करो। आगे की सोचते हैं कि क्या करना है।" 

  रामनारायण ने बङी मुश्किल से सावित्री को चुप कराया। और खुद शहर को चल दिये। 

   रंजना ने पहली बार पिता को मिलने आते देखा तो खुशी के मारे फूली न समाई। भागकर पिता के गले लग गयी। सचमुच लङकियां कुछ ज्यादा ही निश्छल होती हैं। भाई की करतूत बताने का अवसर रंजना को न मिला। भूमि व दूसरी लङकियों के सामने इस विषय में चुप रहना ही ठीक था। मौका देखकर एकांत में सब बता देगी। पर रामनारायण को चेहरा कुछ उदास था। नाटक करने में भी कुछ लोगों का जबाब नहीं होता है। 

   " बेटी। पङोस बाली सरला दादी बहुत बीमार है। तुझे याद है तुझे बचपन में कितना प्यार करती थीं। अंतिम सफर से निकलते समय भी तुझी को याद कर रही हैं। जल्द अपने कपङे रख और घर चल। जाते हुए की आखरी इच्छा पूरी करनी चाहिये।" 

   रंजना की आंखों के समक्ष सरला दादी का प्रेम आ गया। बचपन में जब माँ उसे पीटती थी तो वही तो उसे बचाने आती थी। कई बार चुपचाप रंजना को मनपसंद चीजें खाने को दे जातीं। आखिर एक दिन माँ ने उनसे बङा झगड़ा किया। क्यों लङकी को बिगाड़ रही हों। फिर उसके बाद वह घर नहीं आयीं। रंजना दादी से मिलने को बैचेन हो उठी। जल्द अपने कपङे बैग में रखकर पिता के साथ चल दी। दादी की बीमारी की खबर में सोहन की आवारागर्दी की बात वह भूल ही गयी। रंजना दादी से मिलकर वापस हास्टल आने के लिये चल दी। उसे पता ही न था कि अब वह कभी विद्यालय वापस नहीं आ पायेगी। 

    घर पहुंचते ही वह दादी के घर की तरफ मुङी कि रामनारायण ने थोड़ा कङाई से उसका हाथ पकङा और घर के भीतर ले चले। भीतर कमरे में सावित्री पहले से ही उसका इंतजार कर रही थी। 

  " यह लो अपनी लाङली को। इसपर इतना लाङ लङाओ कि फिर कभी हमारे खानदान को कालिख लगाने की यह सोचे भी नहीं।" 

   रंजना कुछ समझ ही नहीं पायी। अचानक सावित्री अपने चिर परिचित अंदाज में अपना स्नेह लुटाने लगी। कुछ महीनों से छात्रावास में रहने के कारण वह माँ के प्रेम से दूर थी। माँ भी एक बार में ही कई महीनों के स्नेह का कोटा पूरा करने पर तुली थी। रंजना की कोई भी दलील सुनी नहीं गयी। सोहन के बारे में बोलने पर अलग से पिटाई हुई। लङकी एक तो खुद गुलछर्रे उङा रही है, ऊपर से लङके को बदनाम कर रही है। 

    आखिर में रामनारायण और सावित्री जी ने अपना फैसला सुना दिया। अब कोई पढाई नहीं। जितनी पढाई हो गयी, काफी है। लङकी की पढाई से खानदान की इज्जत ज्यादा महत्वपूर्ण है। जल्द लङका देखकर हाथ पीले कर दिये जायेंगें। बोझ को उतारने का समय आ गया है। फिर रंजना की पढ लिख कर कुछ बनने की इच्छाएं मर गयीं। उनकी भी एक और कब्र बन गयी। हालांकि वह रूह भी अक्सर रंजना से मिलने आती। उसे हौसला देती। पर रंजना यथार्थ में जीना चाहती थी। रूह को भगा देती। रंजना ने अब किसी भी तरह का ख्वाब न पालने का संकल्प ले लिया। आखिर लङकी के कैसे ख्वाब। इच्छाएं तो बस पुरुषों की होती हैं, न कि स्त्रियों की। इस ध्रुव सत्य को रंजना ने स्वीकार कर लिया।

......
रामनारायण जी को जहाँ भी पता चलता, लङका देखने निकल पङते। लङकी का बोझ जल्द से जल्द उतारना था। पर जहाॅ भी जाते, टका सा जबाब पा जाते।

   " अभी लङकी को पढाइये भाई साहब। इतनी जल्द शादी की क्या जरूरत है।"

. कुछ और भी बढकर बोल देते।

  " आप तो कुछ ज्यादा ही पिछङी मानसिकता के प्रतीत होते हैं। हम तो इतनी पिछङी मानसिकता के लोगों से बात भी नहीं करते। आप चाय नाश्ता कीजिये और चलते बनिये।"

  रामनारायण अपमान का घूंट पीकर रह जाते। सावित्री पूछती कि क्या हुआ तो रामनारायण लंबा चोङा भाषण दे देते। लोगों की बुद्धि ही भ्रष्ट हो गयी है। लङकी की पढाई की क्या जरूरत है। ठीक है बच्चू। आप पढी लिखी लङकी ही लेना। बाहर जाने बाली लङकी चार जगह मुंह मारती ही है। लङकियों को आजादी मिलते ही कोई भी अनैतिक कदम उठा लेती हैं। यह ध्रुव सत्य है। तभी तो महिलाओं को नियंत्रण में रखना चाहिये, ऐसा सभी पुरानी पुस्तकों में लिखा है। आखिर हमारे ऋषि मुनि ऐसे ही बात तो नहीं लिख गये। एक बार लङकी को आजादी देकर हम देख चुके हैं। बस पांच महीने में लक्षण दिखने लगे थे। तुरंत स्कूल छुङवाना पङा था। 

   पर सच्ची बात थी कि रामनारायण जी ने पुरानी पुस्तकों को कभी ढंग से पढा ही न था। न जाने कितनी पढी लिखी महान नारियों के चरित्र लिखे हुए हैं। गार्गी तो विद्वानों की सभा में शास्त्रार्थ भी करती थी। घोषा ने कितने ही वेद मंत्रों को लिखा था। लीलावती महान गणितज्ञ थीं। खना जैसी खगोलशास्त्री का मिलना असंभव है। पर सही बात को न सोचकर गलत बातें ही विचार में आती हैं। मूर्ख समुद्र का व्यक्तित्व ' ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। सकल ताङना के अधिकारी।।' को तो अपना लिया। पर खुद भगवान श्री राम का व्यक्तव्य ' मूढ तोहि अतिशय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।।' शायद ही कोई जानता है। अपने हिसाब से परिभाषा रचने में हम वास्तव में बहुत आगे हैं।

................... 

   वैसे हरनाथ जी अभी अपने बेटे सौरभ का विवाह करना नहीं चाहते थे। पर उनकी पत्नी का निधन होने के बाद घर में कोई स्त्री न रही। अब घर की सम्हाल स्त्री ही कर सकती है। लिहाजा जल्द लङके के लिये बहू की तलाश थी। सौरभ भी पढने में कुछ ज्यादा अच्छा न था। दो बार में हाईस्कूल पास किया था। दो बार में इंटर पास करके फिर उसने आगे पढने की इच्छा भी न की। हरनाथ जी भी लङके की हरकत अच्छी तरह जानते थे। घर में न तो धन की कोई कमी थी और न अकेले लङके को लाङ प्यार की कोई कमी। तभी तो सौरभ थोङा बिगङ गया। सुरा और सुंदरी का शौक लग चुका था। एक पुरानी मान्यता कि शादी के बाद सब सुधर जायेगा, हरनाथ जी को भी पसंद थी। जैसे माता पिता द्वारा अतिशय प्रेम देकर बिगाङे लङकों को सुधारने की जिम्मेदारी पत्नी की है। 

  रामनारायण भी रिश्ता लेकर पहुंच गये। वैसे सौरभ को ज्यादा पढी लङकी नहीं मिल सकती थी। पर एक दरौगा जी भी अपनी लङकी की बात चला रहे थे। दरौगा जी की हैसियत रामनारायण जी से बहुत अच्छी थी। तो बात फिसलती नजर आ रही थी। पर ईश्वर चाहते हैं तो बिगङी हुई बात भी बन जाती है। एक तो रंजना का हाईस्कूल का रिकोर्ड बहुत अच्छा था। हरनाथ समझ गये कि लङकी पढाई में अच्छी है। बस बाप दकियानूसी है। फिर बहू को पढा लिखा दिया जाये। लङके की तो औकात है नहीं कि कोई नौकरी कर पाये। पर बहू पढ लिख कर नौकरी कर सकती है। दूसरी बात ऐसी हुई कि दरौगा जी की लङकी से सौरभ की कुंडली मिली नहीं। कुंडली मिलाकर विवाह करने पर दंपति का जीवन सुखी रहता है, ऐसी मान्यता है। इसे कुछ सही कहते हैं तो कुछ अंधविश्वास भी। रामनारायण जी अवसरवादी पुरुष थे। इस विषय में उन्हें पंडितों पर विश्वास न था।फिर लङकी की कुंडली उन्होंने बनबाई भी नहीं थी। पर हरनाथ जी लङकी की जन्म तिथि और जन्म समय से भी कुंडली मिला सकते हैं। कंप्यूटर सोफ्टवेयर से सब आसान है। रामनारायण जी को रंजना के जन्म का समय भी पता न था। आखिर खुशी की बातों को ही लोग याद रखते हैं। जिस समय लङकी का जन्म हुआ, उस मनहूस पल को कभी भी उन्होंने ध्यान नहीं रखा था। पर मन ही मन ईश्वर को मनाते हुए कोई समय बता दिया। 

   रंजना की फर्जी कुंडली सौरभ से बहुत अच्छी मिल गयी। फिर भी पंडित जी से राय लेना जरूरी था। पर पंडित जी ने कुंडली देख लङकी के गुणों का ऐसा चित्रण किया कि हरनाथ जी के मन में रंजना को अपनी बहू बनाने की इच्छा बलवती हो गयी। आखिर पंडित जी जिस लङकी के कदम घर में पङते ही घर में सौभाग्य आने की बात कह रहे हैं, तो उसके लिये हरनाथ जी के मन में विशेष आकर्षण तो होगा ही। 

    हरनाथ जी रंजना को देखने आये। रंजना में कोई कमी तो थी नहीं। हरनाथ जी को रंजना बहुत पसंद आयी। पर अलग बात यह थी कि रंजना को हरनाथ जी का व्यवहार बहुत अच्छा लगा। जिस प्रेम से उन्होंने रंजना के सर पर हाथ रखा, उसकी पसंद पूछीं, उसे शादी के बाद फिर से पढाने की बात कही, रंजना इन सभी बातों से विह्वल हो गयी। जिस प्रेम और सम्मान की आशा उसे अपने पिता से थी, वह सब उसे भावी ससुर में नजर आयी। वैसे भी ससुर  लङकी का पिता ही होता है। तथा बहू भी किसी अच्छे इंसान के लिये बेटी के समान ही होती है। हरनाथ जी निःसंदेह बहुत अच्छे व्यक्ति थे। पर क्या रंजना के जीवन में फिर से खुशियां आयेंगी या रंजना की इस आशा की फिर से कब्र बन जायेगी, एक प्रश्नवाचक है।

....... 
हरनाथ जी के घर अभी ढोलक बज रही थीं। भले ही उनकी पत्नी गुजर चुकी थीं पर परिवार व पङोस की महिलाओं ने नव विवाहिता का स्वागत किया। यह घर रंजना के मायके के घर से कुछ बङा ही था। घूंघट की ओट से रंजना चुपचाप देख रही थी। रिश्ते की ननदें उसका हाथ पकङकर घर में लेकर आयीं। कमरे में एक महफिल सी सज गयी। आठ दस लङकियां रंजना को घेर कर बैठी थीं। लङकियां भाभी से चेहरा दिखाने की कह रही थीं। 

    " भाभी। अब शर्माने की कोई बात नहीं है। इस कमरे में बस हम भाभी और ननदें हैं। जरा अपना चेहरा तो दिखाओ। हम सबसे परिचय तो कर लो। इस घर में अब ताई तो रहीं नहीं। अगली बार जब हम घूमने आयेंगें तो भाभी पहचान जायेंगी कि यही वह चुलबुली ननद है।" 

   सब लङकियां हँसने लगीं। रंजना ज्यादा शर्मा रही थी। तो एक लङकी ने खुद उसका घूंघट अलग कर दिया। एक तो रंजना दिखने में ठीक थी, फिर कुछ ब्यूपार्लर की कला। लङकियों को ऐसा लगा कि बादल में छिपा चांद बाहर आया है। एक छोटी लङकी बाहर भागकर गयी। सभी को भाभी की सुंदरता की बात कहने लगी। सौरभ मंत्रमुग्ध सा सुन रहा था। खुद की किस्मत पर इतरा रहा था। 

    " अब भैय्या। अपनी जेब ढीली करो। इतनी सुंदर भाभी लेकर आये हो।" 

  " हाँ हाँ क्यों नहीं। पर इस तारीफ के असली हकदार तो तेरे ताऊ जी हैं। उन्होंने ही तेरी भाभी को पसंद किया था।" 

   " तो क्या भैय्या। आप भाभी को देखने भी नहीं गये थे।" 

   " जो पिता की पसंद, वही मेरी पसंद। "

   हरनाथ जी उस दिन को याद कर रहे थे जब लङकी को देखने जाना था। लङके से बोल रखा था कि कल सुबह तैयार रहना है। पर लङके को आवारागर्दी से फुर्सत हो तब तो तैयार हो। सुबह सुबह शराब के नशे में चूर उसकी ऐसी हालत ही न थी कि वह कहीं बाहर जा पाये। तो हरनाथ जी को अकेले जाना पङा था। आज किस तरह सपूत बनकर दिखा रहा है। वैसे उनकी मान्यता थी कि गुणी लङकी बिगङे से बिगङे लङके को सुधार देती है। खुद अपनी जबानी के दिनों में उनके भी कदम बहक गये थे। और शांति ने किस तरह उन्हें दुबारा सही राह पर लाया, यह स्त्री के सामर्थ्य का साक्षात उदाहरण है। सही बात है कि स्त्री उस काम को करने की क्षमता रखती है जो किसी पुरुष के बस की बात नहीं। पर मन ही मन इस बात के लिये डर भी रहे थे कि कहीं उन्होंने पुत्र मोह में एक अच्छी लङकी का जीवन तो नहीं बिगाड़ दिया। 

   दो दिन बाद तक सारे रिश्तेदार विदा हो गये। हरनाथ जी ने अपने छोटे भाई की बेटी सुनीता को कुछ दिन के लिये रोक लिया। बहू को इस घर में रमने में कुछ दिन तो लगेंगे ही। रंजना को आज उन्होंनें अपने पास बुलाया। रंजना बहू की मर्यादा में सिमटकर हरनाथ जी के पास आ गयी। हरनाथ जी बोलने लगे। 

  " बेटी। संसार में वही व्यक्ति धन्य है, जिसके बेटी हो। बेटे यदि एक कुल को तारते हैं तो बेटियां दो कुलों को पार लगाती हैं। फिर भी बेटी का पिता बनने पर लोग क्यों दुखी होते हैं। यदि राजा जनक के घर बेटियां न होतीं तो भला राजा दशरथ को बहुएं मिलतीं। पर दुर्भाग्य वश मैं इतना सोभाग्यशाली न था। जिस दिन तुम्हें देखा, मुझे पहली बार लगा कि मैं भी एक बेटी का पिता बन सकता हूं। तुम इस घर में मेरी बेटी की तरह रहो। तुम्हें किसी तरह की रोकटोक नहीं है। कोई भी जरूरत हो तो मुझसे बेझिझक बोलना।बेटी को पिता से झिझकने की कोई जरूरत नहीं है। तुम सुनीता के साथ बाजार घूम आओ। अपने हिसाब से सहूलियत के कपङे खरीद लाओ। जिन कपङों में तुम्हें आराम लगे, पहन सकती हों। कपङे तो शरीर ढकने का साधन मात्र हैं। आज के बाद तुम्हें पर्दा करने की कोई जरूरत नहीं है। " हरनाथ जी ने रंजना के सर पर प्रेम से हाथ रख दिया। रंजना खुशी के मारे रोने लगी। जो लङकी बचपन से प्रेम के लिये तरस रही थी, उसे इतना प्रेम मिलेगा, यही कल्पना किसी को भी आंसुओं के सैलाब में डुबो सकती है। रंजना को हरनाथ जी ससुर के स्थान पर पिता ही लगने लगे। अपने पिता के गले लगना चाहती थी पर फिर संकोच के कारण उनके पैरों में गिर पङी। रंजना के नयन विंदुओं से हरनाथ जी के दोनों पैर गीले हो गये। 

   सुनीता अपनी भाभी को बाजार ले गयी। बाजार में दोनों खूब घूमे। काफी सूट तथा और भी कपङे खरीदे। बाजार में रंजना ने आज चांट भी खाई। दोनों ननद और भाभी फिर घर के लिये निकल लीं। 

   रंजना के बाजार जाने के बाद हरनाथ जी ने सौरभ को पास बुलाया। वैसे तो सौरभ अपने मन की करता था फिर भी हरनाथ जी का फर्ज उसे समझाना था। 

    " देखो बेटे। रंजना को बहुत सोचकर तुम्हारे लिये पसंद किया है। वह तुम्हें बहुत खुश रखेगी। पर तुम्हें भी उसे खुश रखना होगा। उसकी इच्छाओं का सम्मान करना होगा। बहू पढाई में होशियार है। आगे पढना चाहती है। अभी कुछ साल तुम उससे दोस्ती का सा व्यवहार रखना। वैसे भी अभी उसकी उम्र ही क्या है। "

   सौरभ ने प्रत्यक्ष में तो पिता का विरोध नहीं किया। पर पिता की बात को उसकी नजर में कोई मोल न था। पत्नी भला दोस्त कैसे हुई। पति स्वामी होता है। पत्नी उसकी दासी होती है। पत्नी का कर्तव्य पति के हर आदेश को मानना है। पति की हर जरूरत को पूरा करना पत्नी का धर्म है। तथा शारीरिक जरूरत भी तो जरूरत ही है। यदि लङकी बच्ची लग रही थी तो शादी क्यों करके लाये। अब आखिर मेरी भी कुछ जरूरत है। 

    पत्नी को पढाने के विषय में सौरभ के विचार पिता से पूर्ण पृथक थे। पढाई का मोल पढे लिखे इंसान को ही पता होता है। किसी तरह बारहवीं पास सौरभ की नजर में पढाई की कोई कीमत न थी। फिर पत्नी पढकर पति से आगे निकल गयी तो पता नहीं, वह पति की बात माने या न माने। कम पढे लिखे मर्द में असुरक्षा की भावना तो होती है। 

   पढने जाती लङकियों को लङकों की बुरी नजर व फब्तियों को झेलना होता है। वह खुद भी तो यही सब करता था। फिर उसकी पत्नी को कोई लङका छेङे, इसमें बेइज्जती ही होगी। खामखाम किसी से झगङा हो सकता है। संभव है कि जिससे झगड़ा करने पहुंचे, वह खुद का ही कोई पुराना दोस्त निकल जाये। कोई ऐसा साथी जिसके साथ मैं भी बाजार में खङे होकर लङकियों को छेङा करता था। 

    सौरभ और रंजना की सुहागरात थी। रंजना भी अपने जीवन साथी से बात करना चाहती थी। उसे दोस्त की तरह अपने मन की बात बताना चाहती थी। सौरभ की इच्छाएं भी जाननी थीं। आखिर तभी तो मिलकर दोनों अपना बेहतर भविष्य बनायेंगे। हर कदम में एक दूसरे का साथ देंगें। सौम्य पिता के पुत्र के भी उन्हीं की प्रतिमूर्ति होने की ही आशा थी। 

    पर रात में सौरभ का असली चेहरा सामने आया। शराब के नशे में चूर सौरभ सिर्फ मर्द था। उसे पत्नी की इच्छाओं की कोई परवाह न थी। बस उसे एक खूबसूरत लङकी का जिस्म दिखाई दे रहा था। रंजना की कई आशाओं का उस रात कत्ल हो गया। उन सभी की कई कब्रें बन गयीं। विवाह के एक महीने बाद ही रंजना पेट से थी। हरनाथ जी सर पकङकर बैठ गये। सचमुच आज उन्हें रंजना को अपनी बहू बनाने पर अफसोस हुआ। रंजना तो सपने देखना भूल ही चुकी थी। सपने देखकर फिर उनका टूट जाना ज्यादा दुख देता है। हरनाथ जी आंखें रंजना को देखकर नम हो जाती थीं। रंजना भी हरनाथ जी को देखकर अपने अश्रु प्रवाह रोकने की असफल कोशिश करती। आखिर हरनाथ जी व रंजना ससुर और बहू से अधिक पिता और पुत्री ही थे। 

    एक दिन फिर हरनाथ जी ने रंजना को अपने पास बुलाया। प्यार से नजदीक बैठाया। काफी देर सोचते रहे। मन की बातों को किस तरह शव्द देने हैं, ये विचार करते रहे। फिर धीरे धीरे बोले। 

   " रंजना। निश्चित ही तुम्हें स्वप्न दिखाने का दोषी मैं ही हूं। पर अपनी बेटी को जो स्वप्न मेने दिखाये हैं, उसमें मन में जो इच्छाएं मेने पैदा ही हैं, एक पिता की तरह उन्हें हकीकत में जरूर बदलूंगा। अब जो हो गया, उसे तो मैं वापस नहीं कर सकता। इस साल तो कुछ नहीं हो सकता। पर अगली साल तुम्हें दूर कहीं आवासीय विद्यालय में पढने भेज दूंगा। बच्चे की चिंता मत करना। उसकी देखभाल के लिये आया रख लेना। बङे शहरों में पैसा खर्च करने पर सभी तरह की सहूलियत मिल जाती है। यही सही रहेगा। हाँ.... । इसी तरह अपने बेटी के सपनों को हकीकत से रूबरू कराऊंगा। "

   फिर हरनाथ जी कुछ बोल न पाये। आज फिर रंजना की आंखें आंसुओं से भर गयीं। निश्चित ही हरनाथ जी के रहते रंजना की इच्छाएं पूर्ण होंगीं। इसमें संदेह करने का कोई कारण नहीं है। फिर भी जिस तरह आज तक रंजना की इच्छाएं मरती रही हैं, उनकी कब्र बनती रही है, उससे मन में चिंता तो हो ही जाती है।

....... 
रंजना का सातवां महीना चल रहा था। हरनाथ जी ने रंजना की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक नर्स रोज उसे देखने आती थी। घर के काम के लिये एक बाई रख ली। हर महीने रंजना को डाक्टरनी को दिखाने ले जाते। मन में इच्छा थी कि नातिन आये। दुनिया को दिखा दूं कि बेटी के जन्म पर किस तरह खुशियां मनायी जाती हैं। नर्स और काम बाली बाई भी हरनाथ जी के मन की बात जान गयीं थीं। तभी तो हर रोज चिङाने का कोई मौका न छोङतीं। 

    " बाबूजी। मैं तो बोल देती हूं। छोरा होगा। नयी साङी लूंगी मैं तो।" 

   " तुम्हारी अक्ल पर तो शायद पत्थर पङे हैं। नाती हुआ तो एक नयी साङी और १००१ रुपये इनाम में दूंगा। पर अगर नातिन हुई तो कम से कम २१०० रुपये और पांच साङी तो दूंगा ही। फिर जो मांगों सो। आखिर बेटियां तो नसीब बालों को ही मिलती हैं। फिर बेटी होने पर कंजूसी कैसी।" 

   पर इस बीत सौरभ को ध्यान नहीं दे पाये।  गुणी बहू के आगे लङके को कौन याद रखे। पर शायद यह हरनाथ जी की गलती थी। गलत संगति पाये लङकों का ज्यादा ध्यान रखना चाहिये। कब क्या कर रहे हों। 

    रंजना के पेट से होने पर कुछ दिन तो सौरभ को निराशा हुई। पर जल्द उसे पुराने ऐब याद आ गये। रोज उसके चक्कर कोठों पर लगने लगे। देर रात तक शराब के नशे में धुत वापस आना रोज की बात थी। एक दिन सौरभ वापस आया तो उल्टियां करने लगा। शराबियों के लिये यह नयी बात नहीं होती है। पर आज  स्थिति ज्यादा खराब थी। हरनाथ जी लङके को लेकर अस्पताल भागे। डाक्टरों ने इलाज भी शुरू किया। पर ईश्वर को कुछ और मंजूर था। खुशियां आने से पूर्व घर में मातम पसर गया। रंजना भरी जबानी में विधवा हो गयी। बूढे पिता के कंधों पर बेटे की अर्थी निकली। इस दृश्य को देख सभी की आंखों से आंसू निकले। 

   दुख की बात है। तथा समाज में सभी ने अपनी तरह से दुख प्रगट किया। पर सभी के विचार  हरनाथ जी जितने महान न थे। वैसे इस दुखद घटना में रंजना का कोई दोष न था। वह तो खुद दुखों की मारी थी। पर उसे ही इसका कारण बताने बालों की कमी न थी। बहू के ऐसे पैर घर में पङे कि सब बर्बाद हो गया। अभी एक साल भी न हुआ कि बङे लाङ प्यार से पाला बेटा दुनिया ही छोड़ गया। ऐसे में भी कुछ लोग मन की बात नहीं बोलने देते। भाई साहब तो सीधे थे। जिसने जैसे कहा, मान गये। पर कुछ तो धोखा हुआ है। 

   हरनाथ जी वैसे तो बङे दिल के स्वामी थे। पर जब कोई झूठी बात बार बार कही जाये तो जग का निर्माण करने बाले तीन देवों में एक बृह्मा जी भी भ्रम में पङ जाते हैं। इंसानों की क्या बिसात। बात ठीक भी लगती है। कंप्यूटर ने तो कुंडली मिलाई थी। पंडित जी ने भी बङी अच्छी बातें कहीं। फिर गलत क्या हुआ। इस बुढापे में पुत्र का वियोग क्यों सहना पङा। हरनाथ जी सच्चाई की तह तक जाना चाहते थे। आखिर सच पता चल ही गया। सौरभ की कुंडली से जो कुंडली मिलाई गयी थी, वह फर्जी थी। विनम्रता के भंडार हरनाथ जी भी संयम खो बैठे। रंजना के पिता रामनारायण को जी भर खरी खोटी सुनाई। इससे होनी तो बदल नहीं गयी। पर उनके मन को एक संतुष्टि मिली। 

    हरनाथ जी की नातिन की इच्छा भी पूरी हुई। पर मन में अब वह प्रेम न था। प्रत्यक्ष में तो उन्होंने रंजना को कुछ भी नहीं कहा पर रंजना को बेटी मानकर जो वायदे किये थे, अब उन्हें याद भी न थे। बाई और नर्स की हिम्मत इनाम मांगने की न हुई। कुछ दिनों बाद बाई को हटा दिया गया। आखिर घर में काम करने के लिये रंजना है तो फिर बाई क्यों रखी जाये। कभी रंजना को खुद मनमर्जी रहने के लिये बोलने बाले हरनाथ जी ने भतीजी सुनीता के द्वारा रंजना को संदेश दे दिया कि वह बहू की मर्यादा में रहा करे। जब तक बेटा था तब तक और बात थी। अब दुनिया में कहने बाले बहुत लोग हैं। इसलिये बहू पर्दे में ही रहा करे। ससुर से बात करना भी ठीक नहीं है। 

   रंजना ने यह सब सुना तो रोने लगी। आज पिता और पुत्री का संबंध ससुर और बहू के रिश्ते में बदल गया। बेटी की उन्नति की चाह पिता को थी। ससुर से कुछ कहना भी ठीक नहीं है। एक बार फिर से रंजना की इच्छाएं परलोक सिधार गयीं। कब्रिस्तान में एक और कब्र दिखने लगी। फिर भी इन कब्रों से निकलकर रूहें रंजना को होसला देने आतीं। रंजना उन्हें भगा देती। पर सत्य यह है कि घिसने से ही हीरे को चमक मिलती है। सोना भी तपकर निखर जाता है। संभव है कि रंजना जैसे हीरे को उसकी किस्मत बार बार तराश रही हो। तभी तो कब्रों में बंद उसकी ख्वाहिशों की रूहें उसके पास बार बार आतीं।

....... 

समय में वह शक्ति है जो बङे से बङे घावों को भर दे। फिर भी घावों के निशान तो रह जाते हैं। उन निशानों को शायद ईश्वर भी नहीं मिटा सकते। या संभव है कि वे निशान इंसान को आगे बढने की प्रेरणा देते हों। इस सृष्टि में कुछ भी बेबजह तो नहीं होता।

    रंजना की बेटी तृप्ति दो साल की हो चुकी थी। अपनी तोतली बातों से किसी का भी मन मोह लेती। हरनाथ जी की तो वह जिंदगी बन गयी। पुत्र वियोग की सरिता में भी हरनाथ जी अपनी नातिन के प्रेम की नौका पर सवारी करने लगे। समय के साथ साथ रंजना के प्रति किये व्यवहार पर भी मन में खीझ उठी। अरे मैं भी महामूर्ख व्यक्ति हूं। अब्बल तो सभी का जीवन और मरण पहले से निश्चित है। फिर किसी की मृत्यु का दोषी कोई अन्य कैसे हो सकता है। दूसरी बात धोखा दिया तो रामनारायण ने। रंजना की इसमें क्या गलती। वह तो खुद दुखों की मारी है। बचपन से आज तक न तो पिता ने प्रेम किया, न माँ का प्यार मिला। आदमी भी एकदम निकम्मा और महाशराबी मिला। आज तक किसी ने भी उसकी मन की बात उसे पूछी ही नहीं। ठीक है कि बेटे का गम बहुत बङा गम है। पर रंजना के दुख के सामने मेरा दुख कुछ भी नहीं है। मन में चाह उठती कि रंजना को एक बार फिर से कहें कि " बेटी। अपने पिता को माफ कर दो। अब फिर से मेरी बेटी बन जाओ। पिता और बेटी दोनों एक दूसरे के आंसू पोंछ देंगें। एक दूसरे को हौसला देंगें। तो जिंदगी इतनी कठिन भी नहीं है कि कट न जाये।" पर सच्चाई थी कि उन्होंने जो मर्यादा की दीवार खङी की थी, उसे तोड़ पाना इतना आसान न था। अपराध बोध की भावना उन्हें कभी भी रंजना के नजदीक न आने देती।

   हरनाथ जी ने भले ही रंजना को संदेश दे दिया था कि वह अब बहू की मर्यादा में रहा करे। पर रंजना अभी भी उन्हें अपना ससुर नहीं बल्कि पिता ही मानती थी। पिता जी को निश्चित ही बङा सदमा लगा है। मेरा और सौरभ का कितना साथ। पर पिता जी और उनका तो बहुत साथ था। बेटे के गम में पिता जी कुछ कह गये तो कोई बात नहीं। ऐसे समय में उनकी बेटी उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती। वक्त के साथ एक दिन जरूर पिता जी को अपनी बेटी याद आयेगी। वह खुद बेटी को बात करने के लिये बुलायेंगें। मैं तुरंत भागी जाऊंगी। आखिर एक बेटी को अपने पिता से बात करने में कैसा संकोच।
  
    एक दिन हरनाथ जी बीमार हो गये। कस्बे के डाक्टर से दवा ले आये। पर आराम न मिला। हालत ज्यादा खराब होती गयी। आज रंजना ने हरनाथ जी का निर्देश भुला दिया। वह उनकी बेटी बनकर उन्हें शहर दिखाने ले गयी। कई जांच हुईं। अंत में डाक्टर ने बता दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता। हरनाथ जी कैंसर के एक जटिल रूप के मरीज हैं। तथा रोग भी अंतिम चरण पर है। पर रंजना ने इलाज चालू करने को कहा। डाक्टरों ने जो संभव था, वह प्रयास किया। पर होनी को कौन टाल सकता है। 

    रंजना जिस दिन का इंतजार कर रही थी, वह दिन इस तरह आयेगा, ऐसा रंजना ने कभी नहीं सोचा था। हरनाथ जी ने रंजना को बुलाया। सर पर प्रेम से हाथ रखा। मुंह से स्पष्ट बोल नहीं पा रहे थे। पर उनकी आंखें बहुत कह रही थीं। रंजना को जिस तरह वह बेटी बनाकर लाये थे, वह रिश्ता आज भी जिंदा था। टूटी फूटी वाणी में इतना बोल पाये " बेटी। आगे बढते रहना। पढाई पूरी करना। तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हारे साथ हूं। मेरी रूह हमेशा तुम्हारा हौसला बढायेगी।" 

   फिर शांति छा गयी। अपने ससुर से बढकर पिता हरनाथ जी के शव से लगकर रंजना फूट-फूटकर रोने लगी। जब तक कि उसे अनेकों आवाज सुनाई नहीं देनी लगीं। नजर उठाकर देखा तो कब्रों में दफन अरमानों की रूहें दिखाई दीं। सब यही बोल रही थीं कि" तुम अकेली नहीं हो। आगे बढते रहना। पढाई पूरी करना।" और उन रूहों के साथ उसे हरनाथ जी की रूह भी दिखाई दी। अब वह रूहों को फटकार कर भगा नहीं सकती। आखिर उसके धर्म के पिता उन रूहों के साथ हैं।

...... 
रामनारायण व सावित्री को अपनी बेटी रंजना पर ज्यादा स्नेह आने लगा। आज तक तो कभी भी लङकी को स्नेह किया नहीं था। लङकी को हमेशा बोझ समझा। एक बार शादी करके फिर कभी लङकी को बुलाया नहीं। लङकी गर्भवती थी और ससुराल में देखभाल के लिये कोई स्त्री न थी, फिर भी कोई सहयोग न किया। लङकी विधवा होने के बाद भी कुछ दिन के लिये घर नहीं बुलाया। आखिर मन बहल जाता। पर हरनाथ जी के निधन के बाद दोनों आ गये। रो रोकर उन्होंने घर भर दिया। लङकी अब अकेले ससुराल में कैसे रहेगी। बात सही भी है। पर उनका बार बार ससुराल की संपत्ति बेच देने पर जोर देना अभी भी उनकी गलत नीयत की तरफ इशारा कर रहा था। यह भी क्या चिंतन का विषय है। रंजना इस संपत्ति की मालकिन है। वह जैसा चाहे, वह करे। फिर सुझाव देने का भी समय होता है। रंजना ने ससुराल की संपत्ति खत्म तो नहीं की पर पिता के साथ मायके चल दी।आखिर अकेला जीवन काटना वास्तव में कठिन है। ऊपर से दो साल की बेटी भी है। 

   सावित्री को रंजना का यह व्यवहार पसंद नहीं आया। जब लङकी को मायके में रहना है तो ससुराल में इतना इंतजाम क्यों रख रखा है। पर चुप रही। धीरे-धीरे आगे का विचार करते रहेंगे । आखिर अगर लङकी साथ रहेगी तो खर्च तो हम पर ही करेगी। इसमें भी घाटा क्या है। फिर लङकी के पास चारा भी क्या है। कोई आदमी तो है नहीं कि बिना सहारे के जीवन काट दे। औरत को तो सहारे की जरूरत है। 

    मायके में कुछ दिन तो रंजना को आराम रहा। फिर रामनारायण और सावित्री किसी न किसी बहाने से उससे पैसे मांगने लगे। बहाने भी ऐसे ऐसे कि कोई मना न कर पाये। पिता को इतनी दूर जाना होता है। एक स्कूटर खरीद लेते हैं। फिर लङकी का धन कौन रखना चाहता है। यह तो महापाप है। पर उधार लेकर फिर व्याज सहित वापस करने में कोई दिक्कत नहीं है। भाई की फीस भरनी है। अभी घर में कुछ कङकी है। वर्ना कौन नीच लङकी से धन मांगता है। इन सबसे अलग रंजना की स्थिति घर में नौकरानी की सी होती गयी। तुर्रा यह कि लङकी काम में लगी रहेगी तो दुखों से ध्यान भटकेगा। 

    आज रंजना ने ध्यान दिया कि लङकी तृप्ति सूखी रोटी खा रही है। जब घर में सब घी लगाकर रोटी खाते हैं तो तृप्ति ही क्यों सूखी रोटी खायेगी। बचपन से अब तक माँ को जबाब नहीं दिया। पर रंजना अब केवल बेटी न थी बल्कि तृप्ति की माँ भी थी। 

  " माँ। यह सब क्या है।" 
  "क्या मतलब।" 
  " तृप्ति को रूखी रोटी क्यों खाने को दी है। जब घर में सभी घी लगी रोटी खाते हैं तो मेरी बेटी क्यों रूखी रोटी खा रही है।" 
   
" लगता है कि तू भूल गयी। वह लङकी है। हमारे घर में लङकियों को घी लगी रोटी नहीं खिलाई जातीं। हमने तुझे भी कभी घी लगी रोटी नहीं दी थी।" 

" बिलकुल याद है माँ। और वह पिटाई भी याद है जो आपने मुझे कमरे में बंद करके लगाई थी। पर तृप्ति आपकी बेटी नहीं है। वह मेरी बेटी है। वह सारे सुख पायेगी जो एक लङके को मिलते हैं। पढाई और आगे बढने के पूरे अवसर भी पायेगी। उसके दादा की भी यही इच्छा थी। "

  " तो ये इच्छा इस घर में तो पूरी नहीं हो सकतीं। तू यहाँ से चली जा। फिर अपने मन की करना। हमारे घर के तो कुछ नियम हैं। "

   कहने को तो सावित्री ने कह दिया। फिर डर लगा कि कहीं रंजना सचमुच चली गयी। अभी तो ससुराल में घर है। यह तो सोने का अंडा देने बाली मुर्गी है। पर दूसरी बात मन में आयी। नाहक परेशान होने की कोई बजह नहीं है। रंजना कोई मर्द थोङे ही है कि बिना किसी के सहारे के जीवन काट ले। औरत को तो सहारे की जरूरत होती है। लङकी दो चार दिन नाराज रहेगी। फिर अपने आप मेरी बात मानेगी। 

   बेटी का धन मारना शायद सबसे बङा पाप कहा है। चोर, डकैत भी इस पाप को करने से बचते हैं। पर अधर्मियों के इस विषय में अपने तर्क हैं। आखिर बिधवा लङकी को सहारा देना कौन सा आसान काम है। फिर यदि इस सहारे की थोङी सी कीमत बसूल ली, इसमें क्या अधर्म। अधर्म तो लङकी कर रही है। जो अपने आश्रयदाता का सम्मान नहीं करती। अपने ससुराल की संपत्ति किसके लिये जोङ रखी है। जब उसे जीवन मायके में ही गुजारना है तो अपनी संपत्ति पिता और भाई के हवाले क्यों नहीं कर देती। आखिर संपत्ति की रक्षा करना भी कौन आसान काम है। 

   रंजना ने अपने जीवन में बहुत चोटें खाईं थीं। पर आज जैसी चोट उसे कभी नहीं लगी। क्या वह इस संसार में अकेले बिना किसी के सहारे के रह नहीं सकती। क्या अपनी बेटी को अच्छी तरह पाल नहीं सकती। क्या एक स्त्री इतनी असहाय होती है कि उसे हर पल सहारे की जरूरत हो। इसका उत्तर कहाँ मिलेगा। 

   अचानक रंजना के प्रश्न का उत्तर मिला। रंजना के अरमान कब्रों से बाहर निकलकर बोल रहे थे। 

   " रंजना। तुम्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है। तुम अकेले ही सब कर सकती हो। याद करो कि तुम्हारे धर्म पिता ने क्या कहा था। उन्होंने कहा था कि आगे बढते रहना। अपनी पढाई पूरी करना। तुम उन्हें अपना पिता कहती हो। खुद को उनकी बेटी बोलती हो। तुमने अपने पिता की बात मानी। नहीं ना। अब उठो। किसी का सहारा मत देखो। खुद पढकर और बढकर दिखाओ। खुद के लिये नहीं बल्कि अपनी बेटी के लिये। जब वह तुम्हें आगे बढते देखेगी तो खुद जान जायेगी कि लङकियां किसी से कम नहीं। रंजना... ।तुम कर सकती हो। नहीं.. नहीं ।गलत कहा। तुम्हें करना होगा। तुम्हें करना चाहिये। "

   रंजना रूहों से प्रतिवाद करने के मूड में थी। 

  " नहीं... ।यह कैसे हो सकता है। मैं एक लङकी। वह भी अकेली। नहीं कर पाऊंगी मैं। "

  " कर पाओंगी बेटी। तुम्हीं करोंगीं। मैं अभी तुम्हारे साथ हूं। "

   रंजना को यह आवाज कुछ जानी पहचानी लगी। देखा तो यह तो हरनाथ जी थे। आज भी रंजना की अरमानों की रूहों के साथ खङे, उसका होसला बढा रहे थे। अब रंजना को कोई संदेह न था कि वह यह सब कर  पायेगी। अकेले बिना किसी सहारे के बहुत कुछ करने के लिये अगली सुबह ही रंजना ने अपना मायका छोङ दिया। रामनारायण ने सावित्री को बहुत फटकारा। आखिर उसी की बेबकूफी से सोने का अंडा देने बाली मुर्गी भागी है। पर उन्हें अभी भी उम्मीद थी कि दो चार दिन ठोकर खाने के बाद रंजना फिर से आयेगी। पर जिन्हें हौसलों के पंख मिल जाते हैं, वे कभी पीछे नहीं देखते, यह कहावत शायद रामनारायण व सावित्री ने कभी सुनी ही न होगी।
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रंजना मायके से वापस ससुराल जाने के लिये निकली ही थी कि रास्ते में उसे सरोजनी  विद्यालय दिखाई दिया। विद्यालय ने बहुत तरक्की कर ली थी। अब विद्यालय का नाम सरोजनी आवासीय महाविद्यालय लिखा था। यानी कि अब इस विद्यालय में कम से कम ग्रेजुएशन तक की पढाई होने लगी है। भले ही वह यहाँ बस पांच महीने रही थी, पर उन दिनों की यादें अभी भी मन में शेष थीं। कुछ पल रुककर देखने लगी। तभी किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा। एक बहुत स्मार्ट सी, रंजना के बराबर आयु की लङकी खङी थी। पहले तो रंजना उसे पहचान नहीं पायी और पहचानते ही उसके गले लग गयी।

   " तुम भूमि... । यहाँ।"

   फिर दोनों सहेलियाँ गले लगकर रोती रहीं। भूमि पढ लिखकर इसी महाविद्यालय में अध्यापिका थी। और भी पहचान के अध्यापक विद्यालय में मिल गये। आप बीती बताने का दौर बहुत देर चला।

   चपरासी का काम वैसे रंजना के हिसाब का न था और न उसे खुद व बेटी के पालन पोषण के लिये इस काम की जरूरत थी। पर रंजना ने यह काम स्वीकार कर लिया। वह विद्यालय में समय गुजारना चाहती थी। फिर से अपना आत्मविश्वास हासिल करना चाहती थी। विद्यालय ने कभी भी रंजना से चपरासी जैसा काम नहीं लिया। वह अध्यापकों के रजिस्टर मैंटेन करना, फाइल बनाने जैसे काम करने लगी। साथ ही साथ पढाई को भरपूर समय मिलने लगा। भूल चूक पर समझाने बाले कई अध्यापक थे। निश्चित ही दुनिया में केवल खराब लोग नहीं हैं बल्कि काफी अच्छे लोग भी हैं।चपरासी के काम से उसे जितना वेतन मिलता, लगभग उतना ही वेतन वह तृप्ति की देखभाल करने बाली आया को देती है। यदि रंजना को यह वेतन न भी मिले तो भी वह शायद इस नौकरी को कर लेगी क्योंकि इसका खास उद्देश्य है। 

   रंजना द्वारा चपरासी की नौकरी करने की बात एक बार समझ में भी आ गयी फिर भी कब्रिस्तान के सामने घर लेना तो ठीक नहीं है। भूमि ने भी उसे समझाया। पर रंजना ने भूमि की बात नहीं मानी। 

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   कल रंजना की इंटर की परीक्षाएं शुरू होने जा रही हैं। रंजना की तैयारी एकदम बेहतर है। थोङी देर को कब्रिस्तान की तरफ देख रही है। फिर अपनी पढाई को रिवाइज करेगी। तभी उसे खुद के मरे हुए अरमानों की रूहें कब्रों से निकलते दिखाई दीं। वे सभी रंजना का हौसला बढा रहे थे। अग्रिम बधाईयाँ दे रहे थे। फिर रंजना ने हरनाथ जी को देखा। जैसे देव चित्रों में देवता आशीर्वाद देते हैं, उसी तरह। रंजना ने अपने धर्म के पिता के समक्ष सर झुका दिया। सभी रूहें गायब हो गयीं। रंजना मुङ रही थी। कि उसे लगा कि अभी भी कोई है। कोई है जो छिप रहा है। 

   " कौन है। मेरे सामने आओ।" 

   आखिर एक रूह सामने आयी। हाथ जोङे, सर झुकाये। अपने जीवन साथी सौरभ को देखकर रंजना रो पङी। 

   "रंजना। मैं गलत था। मेने कभी तुम्हारी कद्र नहीं की। पर तुम आगे बढना। मेरी बेटी को दिखाना कि कोई लङकी कमजोर नहीं होती है। तुम उसकी प्रेरणा बनना। तुमसे कुछ मांगने का हक तो नहीं रखता। फिर भी मांग रहा हूं। अपना हौसला बनाये रखना। हमेशा.. ।हमेशा.. ।" 

   रंजना भी भाव विह्वल हो उठी। 

" मेरे प्राणेश्वर। भले ही इस जन्म में हमारा साथ ज्यादा न रहा फिर भी आप मेरे  स्वामी हैं। आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी। तृप्ति को सही दिशा दिखाऊंगी। न केवल खुद आगे बढकर दिखाऊंगी, बल्कि तृप्ति को भी शिखर पर पहुंचाऊंगी। यह मेरा वायदा है आपसे। मैं एक स्त्री हूं। स्त्री कोई भी वायदा करे, उसे हर हाल में निभाती है। यह तो आप जानते ही हैं। "

   फिर आंसुओं के सैलाब में कुछ भी दिखना बंद हो गया। आंसू पोंछते पर रंजना ने देखा कि कोई नहीं है। अब रंजना अपने कमरे में कल की परीक्षा का रिवीजन कर रही है। थोङी देर पूर्व उसने अपने पति की रूह को जो वायदा किया है, उसकी पूर्णता में लेखक को कोई संदेह नहीं है। सही कहा है कि यदि कोई स्त्री कुछ ठान ले तो विधाता भी उसे पीछे नहीं कर सकते। खुद भगवान राम भी रावण पर बिना देवी कृपा के विजय नहीं पा पाये थे। वास्तव में सृष्टि कर्ता की पूर्ण सृष्टि नारी ही है, न कि नर।

रचनाकार : दिवा शंकर सारस्वत ' प्रशांत'