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मेरे सपने! इस कहानी के माध्यम से मैं, अपनी और अपनी तरह उन महिलाओं की जिंदगी की कहानी बता रही हूँ जो
सपने तो बहुत देखती है पर कुछ मोड़ ऐसे आते हैं जिंदगी में कि, सपने खो से जाते हैं। मैंने भी अपने जिंदगी में ऐसे सपने देखें हैं और उसे पूरे करने की कोशिश में हूँ पर, मेरे साथ मेरे सपने तो हैं ही लेकिन साथ में अपना पूरे परिवार को एक सूत्र में बांध कर चलने की जिम्मेदारी।
मेरा सबसे बड़ा सपना है कि लोग मुझे मेरे नाम से जाने।
मेरी एक अलग पहचान हो। अपने परिवार और बच्चों के साथ साथ मैं अपने सपने पूरे करने के लिए मेहनत भी कर रही हूँ। सपने मैंने देखें हैं तो उसे पूरे भी मैं ही करूँगी, ये मेरा खुद से वादा है।
ये कहानी सीमा की है। सीमा एक काफी पढ़ी लिखी घरेलू महिला है। और वो अपना पूरा दिन घर और बच्चों के काम करके ही बिताती है। वो कभी बच्चों को पढ़ा रही होती तो कभी उनको कुछ खाने पीने को दे रही होती। पूरे घर की जिम्मेदारी सीमा के कंधे पर थी फिर भी सीमा खुश रहती थी।
वो अपने बच्चों के साथ खूब खेलती थी। एक दिन वो अपने बच्चों के साथ बैठी बातें कर रही थी तो, उसने अपने बच्चों से पूछा! "बेटा, आप बड़े होकर क्या बनोगे?" उसकी आठवीं में पढ़ने वाली बेटी ने कहा, " मम्मी मैं तो डॉक्टर बनूंगी!"
सीमा ने कहा, हाँ बेटी, सबकी जिंदगी का कोई ना कोई उद्देश्य होना चाहिए। बहुत अच्छी बात है कि तुम डॉक्टर बनना चाहती हो।
तभी सीमा के बेटे ने कहा, मम्मी जी! आप हमारी बात छोड़ दीजिए। आप ये बताइये कि जब आप हमारी उम्र की थी तो आप क्या बनना चाहती थी?
सीमा ने कहा, मेरा तो बहुत कुछ बनने का मन था बेटा! "
फिर बेटे ने कहा! फिर आप बनी क्यों नहीं। आप पढ़ लिख कर भी घर के काम करती रहती हो।
" बताती हूँ बेटा! जब मैं छोटी थी तो मैं अपनी मम्मी के साथ अस्पताल जाया करती थी तो, वहाँ डॉक्टर को देख कर मेरा भी मन करता था कि मैं भी डॉक्टर बनूंगी। अपने टीचर को पढ़ा ते देखती थी तो सोचती थी कि मैं भी टीचर बनूंगी। स्कूल में माली को पौधे के साथ देखती थी तो सोचती थी, मैं भी फूलों के करीब रहूँगी। जब कभी किसी की शादी में स्वादिष्ट खाने को देखती तो मैं सोचती कि एक दिन मैं भी शेफ बनूंगी। इस तरह से मेरा मन बहुत कुछ बनने का करता था। सीमा के बेटे ने हैरत से कहा! अच्छा मम्मी आपको इतना कुछ बनने का मन करता था।
सीमा ने कहा! इतना ही नहीं बेटा! जब मैं कोई अच्छी कहानी पढ़ती तो मेरा मन कहानियाँ लिखने का करता। लेखिका बन जाने का करता।
यह सुनकर सीमा के दोनों बच्चे हैरान रह गए और कुछ उदास होकर बोले " लेकिन मम्मी, आप तो पढ़ लिख कर भी घर में ही रह गई और कुछ ना बन सकी!"
सीमा हँसने लगी और बोली नहीं बेटा, मेरी बात ध्यान से सुनो। भले मैं घर के काम करती हूँ पर जब तुम लोग बीमार पड़ते हो तो मैं अपने घरेलू नुस्खे से तुम्हें कुछ ही देर में ठीक कर देती हूँ कि नहीं? "
हाँ मम्मी, पिछली बार जब मुझे जुकाम हुआ था तो आपने मुझे एक दिन में ही ठीक कर दिया था। आप तो सच में डॉक्टर हो। सीमा ने कहा! बेटा जब मैं तुम लोगों के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाती हूँ तो मैं शेफ नहीं बन जाती हूँ क्या?
मम्मी! बड़े बड़े शेफ भी आपकी तरह के खाने नहीं बना सकते हैं! हमको तो घर के खाने में इतना स्वाद आता है कि किसी होटल का खाना अच्छा ही नहीं लगता है " बेटे ने कहा। और जब मैं तुम दोनों को पढ़ा ती हूँ तो क्या मैं किसी टीचर से कम होती हूँ क्या? " सीमा ने मुस्कुरा कर कहा।
उसकी बेटी ने कहा " मम्मी " सच में आप बहुत अच्छा पढ़ा ती हैं"! दोनों बच्चे अपनी मम्मी को देख कर मुस्कुरा रहे थे।
तभी सीमा की बेटी ने कहा! " और मम्मी, जो आप कहानियाँ लिखने की बात कह रही थी उसका क्या हुआ? "
सीमा ने कहा! रात को जब तुम दोनों कहानियाँ सुनाने को कहते हो तो जो कहानियाँ मैं तुमको सुनाती हूँ वो मैं खुद बना लेती हूँ।....... और जब मैं घर के बगीचों में नये नये पौधे लगाती हूँ और फूलों की देखभाल करती हूँ तो मैं किसी माली से कम नहीं होती हूँ..... "
दोनों बच्चे बहुत खुश हो गये! बेटे ने पूछा, " तो मम्मी अब और क्या बनने का इरादा है? अभी और कुछ बाकी है क्या? "
हाँ बेटे, एक चीज रह गई है
अभी!.....
वो क्या चीज है मम्मी? "
"अब मैं सिर्फ पायलट बनना चाहती हूँ!"
पायलट!
अब आप पायलट कैसे बनेंगी? " मेरे बच्चों! अब तुम्हारे सपनों को उड़ान देकर मैं पायलट बन जाऊंगी! समझे मेरे बच्चों। जब तुम अपने सपनों की उड़ान भरोगे तो मैं खुद ब खुद ही पायलट बन जाऊंगी तुम दोनों को तरक्की के आसमान पर उड़ते देख कर।
दोनों बच्चे आगे बढ़ कर अपनी माँ से लिपट गये और अपनी माँ को गर्व से देखने लगे।।
श्वेता कर्ण!
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