मै स्त्री "
कुछ मूक सी,निशब्द सी"
हर क्षण खुद से लडती हुई,
खुद पर करती ,अघात मै"
मै,स्त्री"
मै सृजन के. द्धार तक,
पुरुष के .अधिकार तक,
छिन्नमस्तिका,पर छिन्न मै"
मै स्त्री"
निश्छल हूँ प्रेम तक ,
प्रेम के वियोग तक,
राधा सी हूँ,पर भिन्न मै"
मै स्त्री"
धर्म से अधर्म तक,
मान से अपमान तक,
गंगा सी, पवित्र मै"
मै स्त्री"
प्रेम से परिपूर्ण तक,
उपमा मे मै चाँद तक,
कहाँ हुँ बेदाग मै,
मै स्त्री"
पति की जीवनसंगिनी,
संग की अर्धागिनी.
कर्मपथ पर संग मै"
मै स्त्री,
न जता, पाती कभी,
न बता ,पाती कभी"
कितनी हूँ कमजोर मै"
मै स्त्री.
समझो न मै भूल हूँ,
मै ,नही निर्मूल हूँ,
खुद की खुद मै जीत मै,
मै स्त्री"
खुद मे खुद का भाव हूँ,
मै,नही निर्भाव हूँ,
कितने सारे रुप मै,
मै स्त्री"
अब मुझे छलना नही,
किसी ,से अब डरना नही,
स्त्रीत्व ,का तेज मै,
मै स्त्री"
पति का अधिकार मै,
प्रेम का प्रतिमान मै,
पुत्र का अभिमान मै,
मै स्त्री,
रिश्तो की डोर तक,
प्रेम से परिपूर्ण तक,
न किसी की चाह मै,
मै स्त्री"
जो भी चाहा वो मिला,
चाहे ,थोडा कम मिला,
सबको हूँ,महसूस मै,
मै स्त्री,
कदम दर कदम चलूँ,
न कभी पीछे हटूँ .
पथ की अब पहेचान मै,
मै स्त्री,,,
रीमा ठाकुर (लेखिका)

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