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एक इच्छा मन में समाई,
सबने धन दौलत कमाई,
मैं सुकून चाहती थी,
यह दौलत मेरे हिस्से में आई ,
जिसकी जैसी नियत थी,
उसने वैसी कीमत पाई,
किसी ने रुपया जेवर पाया,
किसी ने वाहवाही कमाई,
मैं थोड़ी सी अनजानी थी,
दुनियादारी की बातों से---
कुछ नादान सी बेगानी थी,
हिस्से मे मुझको माता पिता के---
आशीर्वाद की दौलत पानी थी,
कितने जतन करती रही,
अपना सब को समझती रही,
दो बोल प्यार सम्मान के---
लिए हमेशा तरसती रही,
जैसा जिसका भाव होता है---
वैसा मन हो जाता है,
किसी को दिखती माटी की मूरत---
किसी के लिए शिवाला बन जाता है,
दो बोल प्यार के भूखे हैं,
खाए अपनों से धोखे हैं,
सब रिश्ते नाते झूठे हैं,
अपने ही अपनों से रूठे हैं,
दिल से रिश्ता निभाते हैं,
क्यों अपने ही पराए हो जाते हैं,
क्यों समय-समय पर लोग---
अपने रंग बदलते नजर आते हैं,
कुछ ऐसी किस्मत पाई है,
मैंने अपने हाथों में,
एक अपयश रेखा लिखवाई है,
दिल जान जिगर देने पर भी---
क्यू अपनों से मिलती रुसवाई है,
संगीता वर्मा✍✍

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