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जीवन का तो रित यही है
इम्तिहान हमेशा लेती है
कभी चाहूँ खुल कर सैर करुँ तो
पिंज़रे में बंद कर देती है
जीवन मिला मौतों से लड़कर
घुट-घुट कर जी लेती हूँ
चाह कर भी अनचाह बना हूँ
कुछ कहने से भी डरती हूँ
चोटें खाती ज़ख्म को सहती
बुरा कभी ना कहता हूँ
राम-नाम जीह्वों पर रटता
तब प्राण त्याग करता हूँ
लेखक:-विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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