।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
कल्पनाओं को लकीरों में उकेर दिया
कुछ हकीकत तो कुछ मनगढ़ंत भाव लिया ।।
कि जाते हुए पैरों के निशाँ कुछ बदसूरत से लगे
कुछ कलपुर्जो ने, न जाने कैसे तराशा इंसान को
कि आते हुए पैरों के निशाॅन श्री के जैसे खूबसूरत लगे ।।
जिस काया पर लोग रीझते थे
उस माया के मंजर को देखने
चारों तरफ हुजूम लगा के बैठे थे ।।
कि कुछ आंखें खुली तो कुछ ने मींच रखें
आखिर वह काठ थी या मानषी ।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
✍✍✍✍✍
राजेश्वरी ठाकुर
छत्तीसगढ़

4 टिप्पणियाँ