कितना आसन है, किसी को पसन्द आ जाना।
बिना किसी झिझक, ज़रा खुद को झुका जाना।
नज़र को नज़र से मिला कर बात करना ही सही।
गर नज़रें ना मिले, सलाम करना, फिर चला जाना।
सुब्ह मिले या शाम मिले कदर सभी की कर लेना।
क्या पता कब हमें इस ज़मीं के नीचे समा जाना।
मैंने पूछा आग से की कब तलक जलती रहोगी।
बोली वो तब तलक इन बस्तियों को जला जाना।
एक सुनहरा ख्वाब देखा करते रहे ज़िन्दगी भर।
और खुदा के हुक्म पर हम को जन्नत हुवा जाना।
फिरोज़ दहिवाला

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