मेरी चाहत न तुम आजमाया  करो।
दर्मिया सिलसिला कुछ चलाया करो।

क्या बताऊं मुहब्बत की दुश्वारियां।
वक्त बे वक्त ना याद आया करो।

क्या मुकद्दर से अपने गिला हम करें
बे वज़ह फासले ना बनाया करो।

तेरी चाहत में पलते रहे ख्वाब जो।
न मुहब्बत मे मुझको रुलाया करो।

होश खोना हमारा भी है लाज़िमी।
जाम नज़रों से यूं न पिलाया करो।

इश्क़ से अश्क का रिश्ता मशहूर है
रेत के न घरौंदे बनाया करो।

लोग हाथो में रखते हैं अपने नमक।
ज़ख़्म अपना न सबको दिखाया करो।

जीस्त की राह आसान हो जाएगी।
हर कदम पर नज़र आप आया करो 

है ये मुमकिन नहीं भूल जाऊं तुम्हे
दिल से मेरी वफा भी निभाया करो।

** मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी, उत्तर प्रदेश