मदमाती रुत का स्वागत कर शरदऋतु हो चली विदा
और उमंगों की पवन से मन आँगन शीतलता पाता है
तब ऋतुओं का राजा ऋतुराज बसन्त आ जाता है
हर सुबह होती मनभावन, संध्या लिए आती मादकता
रस पीने को जब भंवरा फूलों पर मंडराता है
तब ऋतुओं का राजा ऋतुराज बसन्त आ जाता है
पीली चुनरी ओढ़कर शृंगार किये इतराती धरा
बागों में कोयल संग पपीहा भी गीत मधुर जब गाता है
तब ऋतुओं का राजा ऋतुराज बसन्त आ जाता है
संधान किये हैं मदनदेव प्रेम बाण में पुष्प सजा
सजनी को देख पिया का जब हिय चंचल हो जाता है
तब ऋतुओं का राजा ऋतुराज बसन्त आ जाता है
प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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