भटकती ही नहीं नज़रें ,अब किसी भी बाज़ार में
दिल आज भी शायद कहीं ,उसकी निगहबानी में रहता है।

करती ही नहीं घर, किसी और की उल्फत दिल में
दिल मेरा आज भी शायद, उसकी ही परेशानी में रहता है।

पड़ती ही नहीं कोई और, परछाई इस दरिया में
छिपा हर किनारा उसकी याद के साए ,आसमानी में रहता है।

आता ही नहीं किसी और का, जिक्र मेरी ग़ज़ल में
हर लफ्ज़ कहीं आज भी ,बस उसकी मनमानी में रहता है।

रहती ही नहीं याद किसी ,और की इस अंजुमन में 
उसका मज़ाक भी आयत सा, यूं ही मुंह जुबानी में रहता है।
उसकी हर बात दरो दीवार,महफूज इक निशानी में रखता है।
कैसे कहूं ये हुनर और कलम भी, उसकी मेहरबानी में रहता है।
दिल मेरा आज भी बस उसकी बस उसकी निगेहबानी में रहता है।.....

.............. ✍️ ऋतु बाजपेई 🙏🌅💕