एक छोटी सी लाड़ली ,
चंचल, अल्हड़, नादान,अटखेलियां करती।👸
आँगन में पायल छनकाती ,
लाती घर में खुशियों की बहार।👸
समय ने दिया उसे,
यौवन का उपहार।👸
बड़ी हो चली वह,
सपने मधुर संजोने लगी हृदय में अब।👸
अपने पुरखों की परंपरा,
रीतिरिवाज, संस्कृति, संस्कार की बेल बढ़ाने।👸
जीवन की अनेक पाठशालाओं से,
सीख लेती हुई।👸
लगन की वह बेला आई,
गुंजी शहनाई की आवाज उसी आँगन में। 👸
सजधज कर दूल्हे संग,
बाराती घर की देहरी पर आई।🤴
प्रकृति से मिलने पुरुष ने,
इक सुंदर ब्याह रचाई। 👸🤴
मंगलमय अवसर, मंगल घड़ी, मंगल गीत,
मंगलथाप ,मंगल सिंदूर, मंगलसूत्र, शुभ हल्दी आई।👸🤴
सात फेरे, सात वचन, सात जन्मो,
के लिए किए सोलह शृंगार।👸🤴
देकर अपने मायके को,
ढेर सा शुभ आशीष।👸🤴
बिदा हो चली हम सबकी लाड़ली,
संग अपने पिया, हमसफ़र के साथ।👸🤴
💞 तुम्हारी दीदी 💞
राजेश्वरी ठाकुर

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