लो एक शाम और ढल गई"
खत्म हुऐ ,जिन्दगी के कुछ ,
पल छीन""""""""
पक्षी लौट चले अपने घोसलें
मे,ये जिन्दगी अब तू भी लौट,
आ,अपने घर"""""""
रात होने को है,मन के अंधेरे मे"
फिर से .एक दीया टिमटिमाया,
शायद,कोई""""""
भूला पथिक ,फिर मन के द्धार"
पर आया,,,ये पथिक लौट जाओ,
अब ,खाली है"""""""
अब मन,सब समय की धारा ने"
बहा दिया,,जीने का उल्लास बस,
एक पिजंर है""""""
ये तन, अच्छा रुको ठहरो तनिक
कुछ विश्राम कर लो,बहुत थके से,
हो,साॅस भर लो""""""
नीर भरे थे ,नैनो मे,अब वो भी सूख"
चुके है,तुम प्यासे तो ,होगे पथिक,,
अहसास भर लो""""
मै मन को समझाऊँ कैसे ,तुमको "
जतलाऊँ,कैसे, छोड गये,कुछ मेरे,
कैसे जतलाऊँ मै"""""
तुमको,नीरस मन का हर कोना है"
मन का हर ,रिश्ता बौना  है,भ्रम मे,
जो हरपल जीते थे""""""
चकनाचूर किये,वो सपने,व्यथा यही"
है,मन की मेरी,सारे मेरे थे वो अपने,
यहाँ काँच सा """""
मन ,टूटा है,चुभते है अब सारे सपने"
न कुछ खोया,न कुछ पाया,बिडम्बना,
बस फर्ज निभाया"""""
ये पथिक,तुम खिन्न हुऐ,क्यू ,दोष यहाँ"
कितना है मेरा,,उजडे न कोई घरोदा बस,
इतना ही सार हमारा""""""
अब थकान दूर हो गई,घर जाओ अब रात"
हो गई,दरवाजे पर नजर गडाये,पत्नी रास्ता,
देख रही है""""
अविरल अश्रुधार फिर बरसी,मन की धारा फिर"
कुछ हर्षी,अधरो ने फिर छुआ अधर को प्रेम "
वेदना,फिर से भडकी,
पलटा पथिक ,और फिर बोला 'क्यू संशय मे"
डूब रही तू,नौका तेरी,किसमे अटकी "मै हूँ  तेरा"
भटका साथी""""
तेरे लिऐ ही अखियाँ  तरसी,अधर खुले बेबाक"
खडी मे ,सोच रही ,कुछ मन से मन की ,आँखो"
से दो बून्दे ढलकी"""""""



रीमा ठाकुर (लेखिका)