यादों के हर समंदर में दो तरहा की लहर उठती है। 
कुछ प्यास बुझा देती है, तो कुछ प्यास बढ़ा देती है।

कुछ ऐसे बहाव आते हैं, दिल बाग़ बाग़ हो जाता। 
मौज कुछ ऐसी होती, दिल दर्द का राग जो गाता।
कोई हँसना सीखा जाती, कुछ हँसना भुला देती है।
यादों के हर समंदर में दो तरहा की लहर उठती है।


खुश होना और इतराना, कुछ देर का होता फसाना।
दूसरे ही पल में  ग़म का, उस बीच दाखिल हो जाना।
इन लहरों का क्या कहना, वो आती जाती रहती है।
यादों के हर समंदर में, दो तरहा की लहर उठती है।

जीवन ऐसी इक नैया, पल पल में थपेड़े खाती रहती।
तूफानों से घिर कर भी खुद, अपनी राह निकाले जाती।
ना कुछ भी है अपने बस में, दिल को टटोला करती है।
यादों के हर समंदर में, दो तरहा की लहर उठती है।

यादों की हवा जब चलती, कश्ती के नज़ारे बदलते।
तूफान से दिल घबराता, कभी ठंडी हवा से मचलते।
किस को पता कैसे कब, कश्ती ने राहें बदली है।
यादों के हर समंदर में दो तरहा की लहर उठती है।

कुछ दिलकश दिलकश यादें, रंगीन मछलियों जैसी।
कुछ ऐसी भयानक यादें, लगती है वो मगरों जैसी।
मछली की तरहा यादें, समंदर में उछलती रहती है।
यादों के हर समंदर में दो तरहा की लहर उठती है।




                   फिरोज दहिवाला