पापा की परी से किसी की 
 पत्नी बनना न आसान हैं
 खुशियों की चादर छोड़, दुख का
 कंबल ओढ़ना  न आसान हैं

 विवाह के नाम पे छलती
 आयी यहाँ हर नारी हैं
 तू पराये घर की इस आग में जलती
 आयी हर नारी हैं
 अपनो संग अपनी भी हमको
 पहचान छोड़नी पड़ती हैं
 हर इक को प्यारा ससुराल 
 औऱ नेक पति मिलना न आसान हैं

 पापा की परी से किसी की
 पत्नी बनना न आसान हैं
 खुशियों की चादर छोड़ दुख का
 कंबल ओढ़ना न आसान हैं

 कई अभागिनो संग होता
 ससुराल में अत्याचार हैं
 सिसकियों में कटती दिन राते
 सुनता न कोई पुकार हैं
 राम कहाँ यहाँ किसी पति में
 बहुतो में रावण का वास हैं
 हाथ उठाना शोषण करना
 उनके लिए बहुत आसान हैं
 
 पापा की परी से किसी की
 पत्नी बनना न आसान हैं
 खुशियों की चादर छोड़ दुख का
 कम्बल ओढ़ना न आसान हैं

 पत्नी बन हमें अपने धर्म का 
 पालन करना पड़ता है
 बच्चों की खातिर हमें हाथ उठाने,
 वाले संग रहना पड़ता हैं
 मायके में जो इक चोट से रोती
 ससुराल में दर्द छुपा कर हंसती हैं
 जिसने कभी पापा की डांट न सुनी उसे
 पति का थप्पड़ खाना न आसान हैं

 पापा की परी से किसी की
 पत्नी बनना न आसान हैं
 खुशियों की चादर छोड़ दुख का
 कंबल ओढ़ना न आसान हैं
 
 बर्तन झाड़ू पोछा कपड़ा
 करती हर एक काम हैं
 बच्चों बुजुर्गों पति संग रखती
 मेहमानों का भी ध्यान हैं
 कर्तव्य समझ कर एक मकां को
 घर बनाना पड़ता हैं
 सारा दिन करती ही क्या हो घर पर
 ये सुनना भी न आसान हैं

 पापा की परी से किसी की
 पत्नी बनना न आसान हैं
 खुशियों की चादर छोड़ दुख का 
 कंबल ओढ़ना न आसान हैं

 फिर भी डटी रहो तुम नारी
 कभी नहीं अविचल होना हैं
 सहन करो साहसी बन नारी
 पर सम्मान तुम्हें नहीं खोना हैं
 कभी कभी कुछ पाने की खातिर
 कुछ हमको खोना पड़ता हैं
 पति भी समझेगा तुम बिन
 उसका जीना न आसान हैं 

 पापा की परी से किसी की
 पत्नी बनना न आसान हैं
 खुशियों की चादर छोड़ दुख का 
 कंबल ओढ़ना
    

              थ्रीमा साहू