न धन दौलत न शुहरत बोलती है।
कहीं पर नेक नीयत बोलती हैं।
जहां लगता कोई अपना सा रिश्ता।
वहीं हिम्मत हक़ीक़त बोलती है।
जुबां ख़ामोश नज़रें जब झुंकी हो।
समझ लेना मुहब्बत बोलती है।
बुरा हो या भला हो हर जगह ही।
हमारी नेक नियत बोलती है।
भरोसा जब किया अपनों पे हमने।
लगा हर ओर स्वारथ बोलती है।
सदा नफ़रत की भाषा हो लबों पर।
वहां पंगु सियासत बोलती है।
मेरे ख़ामोश लब की है ये फितरत।
अगर बोले सदाकत बोलती हैं।
ये सच है मान लो तुम बात मेरी।
मिरे चेहरे की रंगत बोलती है।
करूं क्या बात अपनों कि यहां पर
जहां हर पल शिक़ायत बोलती है।
मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी उत्तर प्रदेश

2 टिप्पणियाँ
करूं क्या बात अपनो की....👌👌बहुत ख़ूब जीवन की सच्चाई का बखान आपकी ग़ज़लों में