रंग बिरंगे फूल झूम जाते हैं ---
कण कण  में खुद ही वसंत छा जाता है।
 फिर.....   मुझे वसंत की क्यों प्रतीक्षा ?
प्रिय..........

बाकी चितवन से जब तुम कटाक्ष करती हो----
 तुम्हारे नयन नरगिस बन  जाते  हैं ।
भौहों की प्रत्यंचा से,
 काम के सैकड़ों तीखे तीर फिसल जाते हैं ।
बोझिल पलकों से छन छन कर ---
मदिर गंध उड़ने  लगती है।
 जैसे पी पीकर रितुराज लड़खड़ा जाते हैं ।
फिर .....   मुझे वसंत की क्यों प्रतीक्षा?
प्रिय.  ...  ....

 तुम्हारी जुल्फों की सुगंध को----
 क्या गदराई  अमराई पा सकेगी ?
 तुम्हारा सुरीला गान सुन सकेगी?---
 वसंत में भी क्या कोकिला गा सकेगी?
 तुम्हारा यह सरल सौंदर्य--- 
सैकड़ों  वसंत से मोहक हैं।
तुम्हारा यह यौवन देख--- क्या कभी वसंत वधू इतरा सकेगी ?
प्रिय .....

मेरे जीवन के पल छिन में--- तुम बसंत सी रची बसी हो।
 फिर......... मुझे क्षणिक वसंत की क्यों प्रतीक्षा?
प्रिय.......

 स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय          
         गोरखपुर