अधूरे सपने को पूरा करने की चाह लिए 
एक सायकिल और अपनी टोलियों संग 
निकलती हो हर रोज किसी अलग राह पर ।

सजग नजरें ढूंढती है तुम्हारे, रास्ते पर पडे़ कचरे,
किसी घर के द्वार को या किसी कूड़े के ढेर पर ।

सूखा कचरा, गीला कचरा अलग अलग तय करती हो 
फेंके हुए कचरो में, कुछ खास पाने की क्या पहल तुम 
करती हो। 

क्यूँ खोजती हो तुम इन कचरो में कुछ, अपने घर को पालने का जरिया, आशाएँ, बच्चों की अधूरे ख्वाहिशों को पूरा करने का सामान। 

एक दिन हम घर पर कचरा रख नही पाते, तुम कैसे इन बदबूदार कचरो के ढेर संग चलती हो। 

घिन नही आती तुम्हें, डर नहीं लगता संक्रमण का 
जिसे भी बदबू सहन नहीं होती भूलकर ये भी कि 
तुम भी एक इंसान हो ।

ये अलग बात है कि तुम जरूर मास्क, गल्बस, कोट, पैरों में जूते डाल इठलाती हो। 

कैसे रख लेती हो तुम कदम इन जगहों पर, जहाँ से लोग नाक, भौं सिकोड़ कर आगे बढ़ जाते है। 

पर सही मायने मे, तुम ही इस वसुंधरा को, कचरे बीनकर, साफकर सुसज्जित कर देती हो। 

गर तुम नही होती पक्के इरादो की, हांं ....तुम तो ये दुनियां सच में कितनी मैली होती। 

इस भूमि को तुम अपने हाथों से दमकाती हो। इस धरा को प्रदूषण मुक्त कराती हो। 

तुम्हारा अथक प्रयास ही औरों के जीवन को बडे़ गम्भीर परिणामों से बचाता हैं ।

👵तुम्हें स्वीपर पुकारा जाता है पर तुम सफाई क्वीन हो। 👵



               राजेश्वरी ठाकुर