तुझे पाने के लिए,
हर दर पर सर झुकाया!
जाडा, गर्मी, बरसात में,
खुद को खपाया!
तुझे कोई आँच ना आये,
हर ज़ख़्म खुद को लगाया!
तेरी सलामती के लिए,
अपने तन का अमृत पिलाया!
बेटी को बोझ समझ,
उसे कोख से गिराया!
और तूने मुझे वृद्ध आश्रम का,
रास्ता दिखाया, शायद,
हमने अपनी करनी का,
फल है पाया!
श्वेता कर्ण

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