चले आओ तुम कोई बहाना लेकर
चले आओ तुम वो गुजरा जमाना लेकर।
ऐ वक्त तू कीमत तो बता,
उनको पा लेंगे हम कोई खजाना देकर।
देखो तुम्हारे बगैर डराती हैं तन्हां रातें,
लौट आओ हमदम साज वो पुराना लेकर।
तेरे आके जाने का वक्त भी हो जाता है,
कह ही नहीं पाते बैठे रहते हैं दिल में फ़साना लेकर।
दर्द को जब भी कागज पे उतारा गजब वाह वाही मिली,
लोग कहते हैं आप लिखते हो बड़े शायराना होकर।
तेरे सिवा कौन समझेगा यह कसक मेरे मन की,यही
सोचकें उठ आये महफ़िल से पलकों का झिलमिलाना लेकर।
हमसे पूछों न कोई उन गुजरे लम्हों की कीमत
जो बिताए साथ तेरे , लौटा सके तो लौटा दो कोई नजराना लेकर।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ, उत्तर प्रदेश।

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