मन से मानो तो हर दिन नया सवेरा है। 
नही तो नकरात्मकता की कमी नहीं है। 

ढूँढे अपने चारों ओर खुशियाँ के मंजर।
तो मंदिरों की घण्टों में भी सकुन छिपा है। 

कहीं पायल की झंकार प्रिय कानों को लगती है। 
कहीं रोटी बनाती चूड़ियों में भी प्यार ढला है।

सुरज की छेदो मे से छनकती रोशनी भी।
एक सुखद अनुभव का एहसास कराती है।

किसी को प्रियतम की बोली का ही ।
विनम्र मिला है। 
कोई चाँद की चाँदनी बनकर ही खुश है।

कोई तारों की बिसात पर चलकर खुश है।
किसी मासूम बच्चे की सोच से मिल कर देखो।

कैसे अन्दर से अवगत तुम्हे अपनी।
खुशियों से कराएगा। 
कितना भी इन्सान दुखी हो अपने आप से ।
तृप्त हो जाएगा। 

मन के जीते जीत है मन के हारे हार। 😊🙏🙏

नीलम गुप्ता 🌹🌹(नजरिया )🌹🌹
               दिल्ली