एक आश्चर्यजनक, तीर्थयात्रा की कथा।
ममता के अनमोल रतन की करुण व्यथा।
प्रसून नवजात शिशु का, हृदय का था अंश।
अनेक वर्षों के पश्चात, संपूर्ण गृह के थे वंश।
विषम परिस्थिति, ललिता के विरुद्ध रहा।
करुणा की सागर की, ममता से युद्ध रहा।
प्रसव, शल्य चिकित्सा से फटे जठर थे।
शून्य है नाड़ी, परंतु, तन में अथाह दर्द थे।
पश्चात प्रसव के, थे घाव शिशु के विकट।
क्षेत्रीय युक्ति विफल हुई, था मृत्यु के निकट।
प्रकट देव के संपर्क, सुझाव मिला हुआ सहारा।
उपचार का विकल्प दिए, था सागर का किनारा।
किन्तु अभी दिन के पांच हुए, थे उदर को गूंथे।
चिकित्सक से पूछा, कहा जाओ स्वयं के माथे।
प्रथम यात्रा रेलगाड़ी से, पूरे जीवन काल का।
पथ बांस सी, तीन दिवस के, तीव्र चाल का।
सफल रही त्रिदिवस, यात्रा, मन शांत हुआ।
तमिल थी भाषा, तमिलनाडु का प्रांत हुआ।
दिवस विश्राम के पश्चात, प्रारंभ हुआ उपचार।
चल विचल से, चलता रहा तीन माह लगातार।
क्षण आया, तय हुआ लौटने का वह दिवस।
प्रफुल्लित हुआ, हृदय जो था पहले नीरस।
हृदय चित्त में, अत्यधिक प्रमोद की मात्रा।
चलते चलते कट गए, त्रिदिवसीय यात्रा।
देखे है समान्य प्रसव में, मासो करे विश्राम।
पर क्या था वह, जो किया इतना परिश्रम।
विचलित मन, आघात सिवन से तन में।
करुणा का हृदय है, भिन्न है सर्व जन में।
घाव विकट थे, चल रहा निरंतर उपचार।
एक क्षण, प्राण चला मृत्युलोक के द्वार।
करुणा तन मन से रोते, नित्सर्ग सर्व माया।
पुनः ना आया वह यात्रा, ना आया वह छाया। _________◆●◆__________
सतेश देव पाण्डेय

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