अपने आज में भी, क्यों उसी कल को तलाशती हूं मैं

छोटी से छोटी बात भी, क्यों इतना याद करती हूं मैं

न जाने क्यों , बेवजह की उलझनों को पालती हूं मैं

अजनबी शहर में क्यों , क्यों ख़ुद जैसे ही ढूंढती हूं मैं

हर गली हर मोड़ पर क्यों अपना घर याद करती हूं मैं

चलते हुए अकेले रास्तों पर, खुद में न जाने क्या ढूंढ़ती हूं मैं

हर सुबह हर शाम, चुपचाप मगर कितना शोर करतीं हूं मैं

चौराहों की भीड़ से गुजरते हुए,अपनी पहचान सहेजती हूं मैं

न जाने क्या खोया क्या पाया, क्या बाकी है और क्या ढूंढ़ती हूं मै

सीरतों को ढूंढ़ती सी, मगर सूरतों से घिरा महसूस करती हूं मैं


न जाने कोई भीड़ मुझमें है,या शायद इस भीड़ से अलग हूं मैं

क्यों कोई  बात अजनबी ही,पर क्यों सबको सोचती हूं मैं

न जाने क्यों न जाने क्या, मगर कुछ  नीद में भी तलाशती हूं मैं

........✍️🌄🙏 ऋतु बाजपेई

मौन कभी खाली नहीं होता है इसमें शब्दों की अनंतता होती है।