आओ दोस्तों आज तुम्हें, सुनाती हूँ उस घर की बात
जिस घर में प्यार बरसता था, रहते थे सब साथ साथ

सब लोगों के सामने, एकता की मिसाल था
बारह जनों का वह, परिवार खुशहाल था

माता-पिता, बेटे-बहु और उनके बच्चे
सारे रिवाज़ निभाते, थे वो दिल के सच्चे

मिलजुल कर मनाते थे हर तीज त्यौहार
प्यार भरे रिश्तों से, दुःख भी जाते थे हार

बहन भी सबका प्यार देख, फूली नही समाती थी
भाभियों में हमेशा मानों, सहेली अपनी पाती थी

पर जब एक दूसरे से, विश्वास कभी डिग जाता है
ऐसे में आपस का, प्यार कहाँ टिक पाता है

मतभेद बढ़े,बढ़ते ही गये, तुलसी आंगन की मुरझाई
दो हिस्सों में घर बंट गया, ये कैसी मुश्किल घड़ी आई

रिश्ते रह गए नाम के,छूट गए हाथों से हाथ
वो घर कहीं पे खो गया,जहाँ रहते थे साथ साथ                  

              –प्रीति ताम्रकार
                 जबलपुर