अद्भुत अप्रितम देवदूत स्वरूप सचमुच महाप्राण थे , हिंदी काव्य साहित्य के प्रेमियों के लिए निराला जी किसी परिचय के मोहताज तो नहीं।
उनके बारे में सर्वप्रथम यह बात रखी जाती है कि वह छायावाद के प्रतिनिधि कवि थे मगर वह इससे बहुत आगे उन्हें मानवता के सबसे सजग कवि कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
समाज का सबसे उपेक्षित वर्ग उनकी रचनाओं में प्रतिनिधि बनकर आया है । भिक्षुक कविता आप एक बार ध्यान से जरूर पढ़िए गा, जिसे निराला ने अपनी समस्त समस्त करुणा दी है
वह आता दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
हिंदी साहित्य के कवियों में कबीर के साथ उनसे पहले और उनके बाद कोई भी इतना मुखर नहीं है।
साहित्य के प्राचीन बंधनों को छोड़कर निराला ने छंद मुक्त कविताएं की लेकिन उसमें भी संगीत लयात्मकता रचनात्मकता पूर्ण रूप से विद्यमान थी।
वर दे वीणावादिनी वर दे....
निराला के संबंध में कहा जाता है यह कवि अपराजेय निकला उन्होंने खुद स्वीकार किया कि
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं आज जो कही नहीं
आपका जन्म उस समय हुआ जब विश्व में महामारी फैली हुई थी उसी के कारण उन्होंने अपनी माता को , पुत्री को , चाचा तथा परिवार के कई सदस्यों को खो दिया फिर भी विष पी के उन्होंने अमृत बरसाया जो उनकी सुंदर काव्य रचना में हमें दिखाई पड़ता है।
अभी न होगा मेरा अंत अभी अभी ही तो आया है
मेरे मन में मृदुल वसंत , अभी न होगा मेरा अंत।
इसी क्रम में दूसरी रचना संध्या सुंदरी उनकी काव्य समृद्धि का विलक्षण उदाहरण है जब कवि हौले हौले कह रहा है।
दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से
उतर रही संध्या सुंदरी परी सी
धीरे धीरे धीरे....
हाई स्कूल में पहली बार उनकी कविता 'वह तोड़ती पत्थर' जब पढ़ा तब पता चला कि किसी व्यक्ति का देखने का दायरा इतना विशाल भी हो सकता है ।नारी के विषय में दुहाई देने के बजाय सीधे सीधे उसका इतना गहन चित्रण किया जाए कि रूप स्वत: ही स्पष्ट हो जाए।
वह तोड़ती पत्थर
चढ़ रही थी धूप
गर्मियों के दिन दिवा का तमतमाता रूप
उठी झुलसती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिनगी छा गई
प्राय: हुई दोपहर
वह तोड़ती पत्थर।
उन्होंने क्रांतिकारी और कालजई रचनाएं करके बहुतों को अपना दुश्मन भी बना लिया....
जैसे राजनीति और पूंजीपति व्यवस्था पर चोट करती उनकी कविता देखिए
भेद खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है
देश को मिल जाए जो पूंजी तुम्हारे मिल में है
'जागो फिर एक बार ' और 'कुकुरमुत्ता' जैसी क्रांतिकारी रचनाओं का सृजन करके वह सबसे अलग बन गए।
अपने समय के सबसे प्रगतिशील कवि जिन्होंने रूढ़िवाद जातिवाद और कई कुप्रथाओं का जमकर खंडन किया।
अंत में आज उनके जन्मदिवस पर कितना भी कहा जाए पर्याप्त नहीं होगा लेकिन मैं यह कहना चाहती हूं कि वह पीड़ित मानवता एवं आम जनता के कवि थे।
राबिया शमीम

4 टिप्पणियाँ