भारतीय महिलाओं को प्रणाम कीजिए🙏
 #8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की अगली कड़ी में आज हम बात करेंगे जबाला की

देवी जबाला एक दासी  थी, अलग-अलग घरों में काम करते हुए उस के राजा थे वो उसके साथ भोग भी करते थे तो जब गर्भ से हुई यह सब काम छोड़कर अलग रहने लगी और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। जिस राजा का वह पुत्र था वह नहीं चाहता था कि इसके पीछे मेरा नाम जुड़े।
जबाला स्वाभिमानी स्त्री थी और उसने अकेले ही अपने पुत्र को पाल पोस कर बड़ा किया, अच्छे संस्कार दिए और उसका नाम रखा  सत्यकाम 

उन दिनों गौतम ऋषि जब यात्रा पर वहां आए तो सत्यकाम ने उन से शिक्षा लेने की इच्छा बताई तो गौतम ऋषि ने आश्रम में बुलाया।

वेदों के अध्ययन से पहले उपनयन संस्कार करना अनिवार्य होता है और उपनयन संस्कार में पिता का नाम, गोत्र पूछा जाता है।
जब सत्यकाम अपने पिता  का नाम तथा गोत्र नहीं बता सके तो गौतम ऋषि ने कहा जाओ अपनी माता से पूछ कर आओ।

सत्य की मूर्ति, निडर स्पष्टवादी जबाला ने अपने पुत्र को सच बता दिया कि- "मैं एक दासी हूंँ और मुझे नहीं पता कि तुम्हारा पिता कौन है लेकिन तुम्हें मैंने पाला है, संस्कार दिए हैं तो तुम गौतम ऋषि को जाकर कह दो कि मैं सत्यकाम जबाला हूंँ। यही मेरा परिचय है"।
उस बालक के मुंह से यह सत्य सुनकर गौतम ऋषि बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने कहा कि -"सत्य को कहना और सत्य को स्वीकार करना केवल ब्राह्मण ही ऐसा कर्म कर सकता है अर्थात जो ब्रह्म को जानता हो जो अच्छा संस्कारी हो तुम ऐसी माता के पुत्र हो!
धन्य है तुम्हारी माता"

और उसी समय गौतम ऋषि ने  कहा था कि जिसको भी अपना गोत्र नहीं पता वह गौतम गोत्र लगा सकता है
और यह सर्वथा आज भी मान्य है यदि किसी व्यक्ति को अपना गोत्र नहीं पता तो है अपने नाम के पीछे गौतम लगा सकता है।

जबाला के सत्यनिष्ठा ने इतनी पुरानी परिपाटी को तोड़ दिया जिसमें नारी केवल भोग की वस्तु थी और उसका इतना भी अधिकार नहीं था कि जिसकी संतान को जन्म दे रही है उससे भी सवाल जवाब कर सके।
सत्य के मार्ग पर चलने से कष्ट अवश्य आते हैं किंतु परिणाम हमेशा अद्भुत होता है।
 जबाला का जीवन प्रेरणादाई है शिक्षाप्रद है।
धन्य है ऋषि गौतम जिन्होंने जबाला के सत्य का मान बढ़ा दिया।

#अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की  शुभकामनाएं

       वंदना शर्मा🙏