झर झर बहती जिंदगी की। 
नित नयी खुशबू मिलती है।
ओस की धुंध में छाई।
सूरज की रोशनी भी बेबस लगती है। 

धुंध की चादर इतनी गहरी। 
सूर्य की किरणें भी पार ना कर सकी।
ऐसे में बेचारे इन्सान का। 
सिक्का भी कहाँ चलता है।

दूर तलक तक जब पार नहीं। 
ऐसे में एक ज़रा सा नज़र का। 
फेर भी आपातकालीन।
हाद़से का हिस्सा बनता है।

श्वेत श्वेत बदरा का अंश।
जमीं पर आया लगता है। 
झरने जैसा निरन्तर जीवन। 
इस शमा में थमा थमा सा लगता है।

नीलम गुप्ता🌹🌹 (नजरिया )🌹🌹