पलकों को झुकाकर चलती हूँ क्यूं
ये राज़ तुम्हे है समझाना
क्योंकि मेरी नशीली आंखों में
भरा इश्क़ की मय का पैमाना

उफ्फ़ मेरी अदा कुछ ऐसी है 
मुश्किल है दिल का सम्हल पाना
क्योंकि मेरी नशीली आंखों में
भरा इश्क़ की मय का पैमाना

जो तुमने नज़रें मिलाई सनम
बन जायेगा फिर कोई अफ़साना
क्योंकि मेरी नशीली आंखों में
भरा इश्क़ की मय का पैमाना

गलियों में हमारी कई हैं पड़े
लेके अपने दिलों का नज़राना
क्योंकि मेरी नशीली आंखों में
भरा इश्क़ की मय का पैमाना

दीदार की हसरत छोड़ भी दो
कहीं लूट न ले मेरा शरमाना
क्योंकि मेरी नशीली आंखों में
भरा इश्क़ की मय का पैमाना
                
        –प्रीति ताम्रकार
           जबलपुर