पूरे हॉल में लगभग बीस से पच्चीस लोग होंगें। ये लोग किसी का इंतजार कर रहे थे।इंतजार की घड़ी समाप्त हुई और, " हॉल में एक सज्जन ने प्रवेश किया "!
सबने उन सज्जन का स्वागत किया। उस सज्जन ने, सब लोगों के हाथ में, एक एक गुब्बारा दिया और कहा!
जिसके हाथ में गुब्बारा बचेगा वहीं, जीतेगा। मैं दस मिनट का समय देता हूँ। फिर वो सज्जन हॉल से बाहर निकल गये। 

दस मिनट के बाद, जब वो अंदर आये तो उन्होंने देखा कि, सब के सब अपने खुद के गुब्बारे फोड़ कर दूसरों के गुब्बारे के पीछे पड़े हैं। अगर किसी के हाथ में गुब्बारे बचे हैं तो, एक आदमी के पीछे चार आदमी पड़े हैं उसके गुब्बारे फोड़ने के लिए। 
आखिरकार, सबके हाथ खाली हो गये। उन्होंने सारे लोगों से कहा! 

मैंने कब कहा कि आप लोग एक दूसरे का गुब्बारा फोड़ो। 
मैंने तो ये कहा कि, "जिसके हाथ में गुब्बारा रहेगा, वो ही आगे जायेगा"! आप लोग एक दूसरे को नीचे गिरा कर, आगे बढ़ने के चक्कर में सब के सब पीछे हो गये। 
   यही हाल, आजकल देखने को मिल रहा है। 

एक दूसरे के सहारे से ही आगे बढ़ते हैं लेकिन, एक दूसरे को गिराने से भी नहीं बाज आते। आज अगर सब लोग मेरी बातों को ध्यान से सुनते और कोई किसी का नुकसान नहीं करते तो सब लोग जीत जाते। 

ठीक वैसे ही जैसे भगवान हमें इतना बहुमूल्य मानव तन
देते हैं लेकिन हम एक दूसरे से आगे भागने के चक्कर में, इस जीवन के मूल्य को समझ नहीं पाते हैं और जब ज्ञान होता है, हमारे वापस लौटने का समय हो जाता है। 


      श्वेता कर्ण!