यह छोटा सा घर मेरा जादुई कर दे,
कोने कोने में तेज ज्ञान का भर दे।
सदा रहे आपस में स्नेह ,
न हो कोई स्वार्थ के बस में,
इतना सा वरदान हमें दे।
मन से मन का हो संगम,
बरसे सदा अपनत्व का साबन,
हर जन में आत्मीयता का सृजन कर दे।
तेरे श्वेत कमल के जैसे,
मन में शुभ्रज्योतिसना भर दे।
करके अपनी वीणा के तार झंकृत,
मन के लोभ मोह, कष्ट, सब हर ले।
सबके मन की पीड़ा समझूँ,
सबके आऊँ काम इतनी मुझमें शक्ति भर दे।
बनके बेल बसन्ती झूमू , नव गगन को चूमूँ,
मन में उमंगों का समीर तू भर दे।
तुझको नमन है,वीणा वादिनी,
फैला दे ज्ञान रागिनी जन जन के कष्ट माँ हर ले।
अपने हंस सवारी जैसा दूध पानी को अलग जो कर दे,
चुने गुण हम सब अवगुण अलग तू कर दे।
माँ शारदे सुन विनय हमारी,
अपने मंजुल ज्ञान से मन की सारी व्यथा हर ले
अंजू दीक्षित बदायूँ,
उत्तर प्रदेश।

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