रजत जब से कॉलेज से लौटा था,अनमना सा था,किसी से कोई बात भी नही कर रहा,बस चुपचाप अपने कमरे में उदास लेटा था,उसकी छोटी बहन दिशा को बहुत आश्चर्य हो रहा कि भाई को आज क्या हुआ?रोज तो उसे परेशान करता,कभी कोई शरारत,कभी कुछ और।पर आज??

काफी मनुहार करने पर वो बहन के सामने खुला:अरे तेरे क्लास में वो जो नई लड़की आयी है न,वो आज किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में हमारी क्लास में आई थी,दिखने में तो सीधी लगती है लेकिन है बड़ी घमंडी।

अरे ,तुम उससे कहाँ उलझ गए भैया,दिशा बोली,वो तो नाक पर मक्खी न बैठने दे।बहुत गुरुर है उसे अपने रूप पर,बड़ी सी गाड़ी में आती है रोज ड्राइवर के साथ।सीधे मुंह बात ही नही करती।

उसका दिमाग तो ठिकाने लगाना पड़ेगा,रजत बड़बड़ाया।

अब ,जब भी रजत उस मगरूर लड़की को देखता,उसका खून खौलने लगता,इसे सीनियर्स की इज्जत करनी तो सिखानी पड़ेगी।

जल्द ही उसे मौका भी मिल गया,कॉलेज ट्रिप दो दिन को मसूरी जा रहा था,जिसमें वो लड़की भी थी,रजत ने सोचा वहां इसे कोई न कोई सबक जरूर सिखाऊंगा।

सारे लड़के लड़कियां बहुत खुश थे,खूब एन्जॉय कर रहे थे,सबके ग्रुप्स बने हुए थे,कभी मसूरी झील पर रुक उन्होंने पैरा ग्लाइडिंग का मज़ा लिया,फिर रोपवे से चलकर बायनाकुलर से हिमालय दर्शन किये।
वो मगरूर लड़की,रुही,बहुत सुन्दर थी,यहां फॉर्मल ड्रेस में उसकी खूबसूरती में और भी चार चांद लग गए थे।रजत उसे लगातार देखता रहता पर उसने उसे बिल्कुल भाव न दिया।
अब तो रजत के मन मे उसे नीचा दिखाने की जगह उससे दोस्ती करने की प्रबल इच्छा जागने लगी।लेकिन कैसे,कोई रास्ता नज़र न आता।

अब, सब कंपनी बाग घूमने आए थे।वो पैदल लंबे रास्ते पर हँसते,खिलखिलाते नीचे की ओर चल रहे थे।ऊपर से दूर कंपनी बाग घने वृक्षों के बीच बसा कोई छोटा सा शहर सा दिख रहा था,सबको बेचैनी थी,जल्द ही वहां पहुंचने की।
वो लड़की रुही,तेजी से ढलान पर दौड़ी और अपना संतुलन खो बैठी,वो तो भला हो रजत का जिसने बड़ी चतुराई और सही वक्त पर उसे अपनी बलिष्ठ बाहों से रोक लिया और एक हादसा होने से बच गया लेकिन दूसरा हादसा हो गया,दोनों ही कुछ देर एक दूसरे से लिपटे खड़े रह गए,अलग तब हुए जब दूसरे लड़के लड़कियां उनकी मज़ाक बनाने लगे।

हड़बड़ा के रुही उससे दूर हो गयी,लेकिन उसकी आँखों मे लाज के लाल डोरे तैर गए,वो बहुत सहम गयी थी,पर रजत ने न केवल उसकी जान बचाई थी बल्कि उसका स्पर्श उसे अपने बदन पर अभी भी महसूस हो रहा था,वो ही हाल रजत का भी था।

जब तक वो वहां रुके,रुही छुईमुई सी बनी रही,खोई खोई सी,रजत से निगाह मिलती तो पलकें झुका लेती,रजत को सुकून था,कि ये जितनी मगरूर लगती थी शायद उतनी नहीं थी।वो उससे बात करना चाहता था पर रुही उससे बच रही थी।चोर निगाहों से रजत को देखती,न दिखता तो इधर उधर ढूंढती लेकिन नज़र मिलते ही नजरें झुका लेती।

आखिर उनके लौटने का दिन आ गया,सब बस में बैठ चुके थे और हंसी मजाक कर रहे थे,रजत बस से नीचे उतर कर सबके लिए भुट्टे सिंकवा के ला रहा था,ड्राइवर हॉर्न पर हॉर्न दिए जा रहा था उसे बुलाने को,जब रजत आया,उसके दोनों हाथों में ढेर सारे भुट्टे थे।
सबको देने के बाद,उसने बस में नज़र दौड़ाई तो केवल एक सीट ही खाली थी, रुही के बराबर वाली,
उसने मुस्कराते हुए रुही से पूछा:क्या मैं यहां बैठ सकता हूं।
रुही एक तरफ सिमट गई और वो उसके बराबर बैठ गया।
थोड़ी देर दोनों बिल्कुल शांत बैठे रहे,फिर सब अंताक्षरी खेलने लगे और लड़के लड़कियों की टीम बन गयी।
रजत पर "त"से गाना आया,वो गाने लगा:तेरा फूलों जैसा रंग,मैं तो रह गया दंग…
अब "र"से गाना था,रुही ने अपनी मीठी आवाज में  गाना शुरू किया:रुके,रुके से कदम,रुक के बार बार चलें…

जो बात दोनों एक दूसरे से नही कर पा रहे थे,वो गानों ने करा दीं।

फिर तो रुही ने अपने बारे में उसे बहुत बातें बताईं और उससे पूंछी भी।लगता ही नही था वो पहली बार बात कर रहे थे।ऐसा लगा मानो बरसों से एक दूसरे को जानते हों।

रजत ने उससे कहा:जब तुम पहले दिन मिली थीं तो इतना स्टाइल क्यों दिखा रही थीं,रुही ने जो बताया वो काफी शॉकिंग था।
रुही के पापा ठाकुर वीर सिंह खानदानी रईस हैं,और लड़कियों की पढ़ाई के धुर विरोधी। उसके दो बड़े भाई बिल्कुल अपने पिता की फोटोकॉपी, उनसे ज्यादा सख्त और उसके प्रति उदासीन,उसकी माँ उन सबके सामने बिल्कुल बेबस,ये तो उसकी दादी चाहती थीं कि रुही कुछ साल पढ़ ले,कुछ स्वन्त्रता से जी ले,नही तो उसका घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाये।

इसीलिए रुही ने अपने चारों ओर मगरूर बन एक दीवार बना रखी थी,वो किसी से प्यार करने की बात तो सोच भी नही सकती है।

रजत को ये सब जानकर बहुत गुस्सा आया पर वो क्या कर सकता था।

लेकिन अब वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन चुके थे।
एक दिन रुही ने बताया कि उसकी शादी तय हो गयी है और अब वो कुछ दिनों बाद से कॉलेज नही 
आ पाएगी।
रजत ने जैसे ही ये सुना,वो छटपटा उठा,क्या तुम्हें वो पसन्द है जिससे तुम्हारी शादी हो रही है,उसने पूछा।
क्यों दिल दुखाते हो,रुही कातर होके बोली,उसकी मोटी मोटी आंखों में आंसू बह निकले।
इतना मजबूर रजत कभी नही हुआ था जितना आज हुआ,उसने सोचा,अभी तो मैं कुछ कमाता भी नही जो इसका हाथ मांग सकूँ।
उनका पहला पहला प्यार इस मोड़ पर आकर इतनी जल्द साथ छोड़ देगा,दोनों ने ही कभी न सोचा था।

और फिर वो मनहूस दिन भी आ पहुंचा जब रुही विदा होकर ससुराल चली गयी।
रजत की तो सारी दुनिया ही  सूनी हो गयी थी,उसने रुही को भुलाने की बहुत कोशिश की पर पहले प्यार की वो पहली खुशबू उसके जेहन से उतरती नही थी।फिर उसने जी जान से लगकर पढ़ाई में खुद को डुबो दिया।

कभी कभी कुछ बातें कुछ अच्छा भी करवा जाती हैं,रजत ने जल्दी ही सिविल सर्विस का एग्जाम क्लियर कर लिया और कुछ समय बाद वो बरेली जिले का डी.एम.बन गया।
होनी का क्या मंजूर था कोई नही जानता,उसी शहर में रुही का ससुराल भी था।रुही का पति विवेक वहीं कचहरी आफिस में काम करता था। वो स्वभाव में गुस्सेल और रिश्वतखोर आदमी था।
एक बार किसी केस में फंस गया और अब निर्णय रजत के हाथ मे था।जब रजत को ये पता चला कि वो रुही का पति है वो अजीब असमंजस में फंस गया।
अपने घर मे वो कई बार मां के मुंह से सुन चुका था कि रुही के ससुराल में उससे बुरा व्यवहार होता है,अगर आज उसके पति को सज़ा हो गयी तो पता नहीं उसपर और कितनी मुसीबतें आ जाएं।
उसके दिल मे रुही के लिए प्यार तो था ही,अब सहानुभूति और दया भी उमड़ आयी,जितना बन पड़ा,उसने उसके पति को इस केस से बाहर निकाला और कड़ी चेतावनी देकर रिहा करवा दिया कि भविष्य में इस तरह के विवाद में उसका सम्बन्ध नही मिलना चाहिए।
रुही का पति विवेक शायद कभी नही समझ पाया कि उसपर ये मेहरबानी क्योंकर हुई?परन्तु रजत ने अपने पहले प्यार की मुसीबतों को कम करके एक अजीब सी रूहानी सुकूनियत जरूर महसूस की ।







                      संगीता अग्रवाल