यह ऊँची इमारते गगन को छूती न कि मन को,
दिल इनमें रहने बालों के कभी नही जुड़े बस दिखावे की होड़ गए।

बड़ी बड़ी इमारतों के जादू में
पड़कर लोग छोटा गाँव छोटा घर छोड़ गए।
अपने बचपन जवानी के उन अमूल्य जगहों को,
रोता सिसकता छोड़ गए।
कुछ न पा सके झूठी शानों शौकत और दिखावे
के सिवा, मिले हकीकत से तो अन्दर तक झकझोर गए।
जिन लोंगो की इमारतों के बसाने में उम्र लगा दी,
क्या पहचाना साहब कहा तो साहब  मुँह मोड़ गए।
कितना प्यारा था अपना वो धरातल से लिपटा गाँव,
प्यार ही प्यार बरसता था जिस ओर गए।
यहाँ तो पुकारने पर भी कोई नही सुनता किसी सिसकी,
वहाँ एक आवाज जो उठती थी सब बिना सोचे समझे दौड़ गए।

अंजू दीक्षित
बदायूँ ,उत्तर प्रदेश।