बहुत बदल गई हो तुम
दूसरों को सम्भालते-सम्भालते
खुद ही बिखर गई हो तुम
खुद से नाराज़
और दूसरों की खुशी में ही
खुद को जीने लगी हो तुम
देखो ना कितनी बदल गई हो तुम
दूसरों से रूठी हो
और खुद से शिकायत करती-करती
टूट रही हो तुम
न जाने क्यूँ खुद के ही ख़्वाबों में
जल रही हो तुम
दबे अरमानों को झूठी उम्मीदों से
सींच रही हो तुम
दिन-रात खुद को ही बदल रही हो तुम
देखो ना कितनी बदल रही हो तुम
घर की चारदीवारी और चूल्हे में
अपनी परवाज़ क़ैद कर रही हो तुम
एक दिन आज़ादी मिलने की चाह में
रोज घुट रही हो तुम
खुद से ही खुद की लड़ाई लड़ रही हो तुम
दूसरों का हौंसला बनने के लिए
अंदर ही अंदर मर रही हो तुम
खुद की गुनेहगार
औरों की मसीहा बनने की
नाकाम कोशिश कर रही हो तुम
देखो ना कितनी बदल रही हो तुम
ख़ामोशी से खुद को भुला रही हो तुम
सूखे आँसुओं से खुद को
पत्थर बना रही हो तुम
ज़िंदा इँसा को मुर्दा बनाती जा रही हो तुम
औरों की खुशी के लिये खुद की आत्मा को
तड़पा रही हो तुम
न जाने क्यूँ खुद को खोती जा रही हो तुम
सच कहूँ
बहुत बदलती जा रही हो तुम
या ये कहूँ
बहुत बदल गई हो तुम
खुद की ही अपराधी बन गई हो तुम।।
आरती वत्स✍🏻🌸

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