बदलते मौसम की सौगत
सूर्ख मखमली सा ,वो पलाश,
ले जाता है ,यादो की दुपहरी मे,
बस किचितं,सी अभिलाषाओं की
ओर,भूमिहर किसानो की .पगडंडियो के किनारे"
मेड पर बनाता ,अपना शमिययाना"
खिल उठती है ,पखुँडिया,रंक्तम्भ सी,जैसे नई नवेली ,दुल्हन के गालो,की लाली,आँखो की हया,
चटख,सिन्दूर,माँगो का ,
जब दूर कही डूबता है सूरज"
उसकी ललिमा ,क्षितिज धरती को"
कस लेती है अपने अगोश मे"
बस उस क्षण जुदा होते है दो
नवयुगल ,
चिरपरचित मुस्कान के साथ"
जी लेते है ,पलछिन उस पलाश् 
की छाँव ,भर लेते है वो खुशियाँ
जो बितायी थी,इस मखमली फूलो के संग ,जोड लेते न टूटने 
वाली डोर""""


                 रीमा ठाकुर