जीवन से पहले हो या फिर  मौत के बाद।
ना होता तू जहाँ में, ना होता कोई आबाद।

पहले ना होना यहाँ कैसे कहे कोई बात।
ना ही दिन था देखा ना होती कोई रात।
ना था अपना वजूद, ना थे कोई हालात।

ना करते कोई बात, ना होती फरियाद।
जीवन से पहले हो या फिर मौत के बाद।

ना था जीवन, कैसे तुझे मिलता दिमाग।
ना हस्ती अपनी, कैसे कोई मिलते सुराग।
क्या पता था कैसी होती सूरज की आग।

जीवन का तो अहसास, कैसे होता याद।
जीवन से पहले हो या फिर मौत के बाद।

बाद मौत के ना ही रहती जिस्म में जान।
फिर तो ये इंसान, हर बात से होता अंजान।
दिल तो रुक गया है, क्यों हो कोई परेशान।

बेजान हो जाने से कुछ भी ना होता याद।
जीवन से पहले हो या फिर मौत के बाद।

कब्र में जा कर कर्मो का हिसाब वो करता।
दिन रात अंधेरे में अब हर वक़्त गुज़रता।
कुछ न ले जाने पर गम से दिल को भरता।

कौन सुनता कब्र में अब तेरी फरियाद।
जीवन से पहले या फिर मौत के बाद।

ए ज़िंदा इंसानो, करो तौबा बुरे कर्मों से।
छोड़ के रंजिशें, कर लो सुलह अपनों से।
जियो हकीकत में, दुरी बनाओ सपनों से।

कौन सुनेगा तुमको जब कब्र से दोगे साद।
जीवन से पहले हो या फिर मौत के बाद।



                     फिरोज दहिवाला