छोटी सी लड़की को रोटी बनाते हुए देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। वह सांवली सी बच्ची दस ग्यारह साल से अधिक की नहीं लग रही थी।
"दीदी भूख लगी है मुझे खाना खिला दो न"!
"सीमा एक रोटी बच रही है ,बना लूं फिर सब साथ में खाना खाएंगे।"
मैं उस बच्ची को बड़े ध्यान से देख रही थी ।
रमा मेरे पड़ोस में रहती थी। हम दोनों की आपस में अच्छी दोस्ती थी।अतः हमलोगों का एक दूसरे के यहां किसी भी समय आना जाना हो जाता था।
रमा के तीन बच्चे थे एक लड़का राहुल और दो लड़कियां सीमा और रीमा।
दो महीने पहले रमा के पति का अचानक हृदयगति रुकने से स्वर्गवास हो गया था।
उसके ऊपर तो मानो दुखों का पहाड़ टूट गया था उसकी शादी बचपन में ही हो गई थी आता बच्चे भी कम उम्र में हो गए।
इस दुख के समय में सभी जान पहचान वाले और रिश्तेदार लोग रमा के घर आते थे और सांत्वना के चार शब्द बोल कर चले जाते थे।
रमा के देवर,गांव में रहते थे भाई के मृत्यु की खबर सुनकर वह अपनी पत्नी और दस साल की बच्ची को लेकर यहां आए हुए थे।
रमा के तीन बच्चों के साथ राधा हिल मिल गई थी।
बच्चियां राधा से छोटी थीं । वे दीदी दीदी कह कर उसके आगे पीछे रहती थी।
उसके देवर अपनी पत्नी उषा और बेटी राधा को छोड़कर गांव चले गए ।
गांव में उनकी खेती बाड़ी अच्छी थी । देवरानी भी रमा का बहुत ख्याल रखती थी ।
घर के कामों को मां-बेटी मिलकर कर लिया करते थे ।
रमा का मकान बड़ा था । उनके पति प्राइवेट नौकरी ही करते थे । उन्होंने ऊपर के फ्लैट को किराए पर चढ़ा दिया था। उससे कुछ आमदनी हो जाती थी और उनके देवर गांव से राशन पानी तेल, घी इत्यादि मौसम का सामान भेज देते थे। इस तरह उनके घर का निर्वहन हो रहा था ।कुल मिलाकर सब कुछ सामान्य गति से चल रहा था सिवाय उनके पति के जाने के दुख को छोड़कर। क्योंकि किसी व्यक्ति की कमी कोई नहीं पूरी कर सकता है ।रमा अपने पति की यादों में खोई रहती थी और हमेशा उदास रहती थी ।
वह तो राधा थी कि उनके बच्चों को संभाल रखा था उनको समय से खाना पीना देना और खेलना।
बच्चों को स्कूल भेजती थी और जब बच्चे स्कूल से वापस आते थे तो वह अपनी राधा दीदी को ही खोजते थे।
राधा तीखे नैन नक्श वाली सांवले रंग की थी और बोलती तो ऐसे थी जैसे उसकी बोली में शहद घुला हो ।
वह बच्ची अपने भाई की किताबों को पढ़ती थी क्योंकि गांव में भी उसके पिताजी ने उसे स्कूल नहीं भेजा था।
राधा ने रोटी बनाकर रखा फिर अपनी बहन सीमा को अपने हाथ से खाना खिलाया।
आज उसकी मां की तबीयत नहीं ठीक थी इसलिए घर का सारा काम उसके जिम्मे आ गया था।
ताई कह रही थीं कि राधा रहने दे मैं बना लेती हूं ,लेकिन राधा ने ताई को मना कर दिया। उसे लग रहा था ताई जी बहुत दुखी रहती हैं तो खाना कैसे बनायेंगी।
ताई गांव में जब माँ की तबियत खराब होती थी तो मैं ही खाना बनाती थी।
चाची कहती-"राधा तुम भी स्कूल जाया करो इस बार जब नया दाखिला होगा तो मैं तुम्हारा दाखिला करा दूंगी।"
राधा की नन्हीं आंखें खुशी से चमक जाती थीं।
अब राधा कॉपी पेंसिल लेकर बैठ गई और दोनों छोटी बहनों सीमा और रीमा को भी पढ़ने के लिए बैठाया। रामा जी का बड़ा बेटा राहुल पढ़ने में बहुत होशियार था राधा उसके पास बैठकर थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना सीख गई थी।
रमा अपने गम से उबर सके इसके लिए मैं प्रयत्न करने लगी । मैं उसे लेकर बाजार,किसी सहेली के घर,धार्मिक समारोह में जाने लगी जिससे समाज धीरे धीरे सामान्य जीवन की तरफ बढ़ने लगी।
क्रमशः……
भाग २
राधा अब मुझे भी चाची कहने लगी थी।
दोनों बहनों को लेकर मेरे घर आ जाती थी और मेरी बेटियों के साथ खूब मजे करती।
रमा उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती थी ।अब वह उसे घर का काम नहीं करने देती थी । जेठानी भी गांव वापस चली गई थीं।
आज राधा बहुत खुश थी वह पहली बार स्कूल जो जा रही थी ।आज उसका स्कूल जाने का सपना जो पूरा हो रहा था।
वह रास्ते भर सोचती हुई जा रही थी कि गांव में किस तरह सुबह उठकर मां के साथ काम में लग जाती थी। पिताजी बात बात में उसे और मां को डांटते रहते थे लेकिन मां बेटी की हिम्मत नहीं होती कि मुंह से एक शब्द भी निकले।
उसके पिताजी लड़कियों की शिक्षा के भी खिलाफ थे। उसे गांव में मालूम ही नहीं था कि लड़कियां स्कूल भी जाती हैं क्योंकि उसकी जानकारी में कोई भी लड़की स्कूल नहीं जाति थी।
उसके पिता का मत था कि लड़कियां घर का कामकाज करें क्योंकि उन्हें ब्याह कर दूसरे घर जाना है । वहां ससुराल के लोग उसके किसी भी काम में कमी ना निकाले और मां-बाप को न चार बात न सुनने को मिले।
अपनी भाभी के सामने उन्होंने दबे जुबान से उसे स्कूल भेजने के लिए विरोध किया था लेकिन रमा ने अपने तर्कों से उन्हें चुप करा दिया।
राधा विद्यालय की दुनिया को देख कर बहुत आश्चर्यचकित थी । पहली बार घर से बाहर जो निकली थी। राधा को शुरुआत के दिनों में पढ़ाई के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी लेकिन उसके उत्साह को देखकर स्कूल के टीचर भी उसे बहुत खुश रहते थे।
वह अपनी चाची के साथ बाहर के कामों के लिए भी निकलने लगी जैसे बाजार जाना ,अपने भाई बहनों के लिए कपड़े पसंद करना , उनके जन्मदिन की तैयारियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना इत्यादि।
कुछ समय बाद इतनी एक्सपर्ट हो गई थी कि चाची का उसके बिना काम ही नहीं चलता था वह सब से कहती रहती थीं ….. ""हमारी राधा इतनी सयानी हो गई है कि उसके बिना मैं तो किसी काम के बारे में सोच भी नहीं सकती हूं""।
समय चक्र अपनी गति के साथ चलता रहा।
आज राधा का बोर्ड के एग्जाम का रिजल्ट निकला था। राधा बहुत अच्छे नंबरों से पास हुई थी । अपने स्कूल में उसका प्रथम स्थान था बोर्ड की परीक्षा में।
राहुल भी ट्वेल्थ के एग्जाम में अच्छे नंबरों से पास हुआ था। घर में खुशी का माहौल था । पड़ोस में लोग राहुल और राधा के अच्छे नंबरों की चर्चा कर रहे थे।
"चाची मैं आपके बदौलत स्कूल जा पाई। वह भावुक होते हुए अपनी चाची के गले से लग गई ।
चाची ने उसे दुलारते हुए कहा कि"" अरे पगली तू तो है ही इतनी अच्छी और मेहनती।""
"मैंने क्या किया है--" तूने तो अपने भाई बहनों को इतने प्यार से रखा कि उन्होंने मुझे परेशान करना बंद कर दिया। नहीं तो मैं इन्हें संभालते संभालते बहुत परेशान हो जाती थी।""
घर में खुशी का माहौल था राधा भागते हुए मेरे घर आई और बोली "" चाची आज आप लोगों की पार्टी है मेरे घर पर। मेरी चाची आपको अभी बुला रही हैं । आप आ जाना थोड़ी देर में"*।
यह कहकर वह चली गई।
थोड़ी देर बाद मैं रमा के घर गई वहां पहुंचकर मैंने देखा कि सबके चेहरे उतरे हुए हैं राधा की आंखें रो रो कर सूजी हुई थीं। मैंने कहा __क्या बात है ?
आज तो खुशी का दिन है और तुम लोग पार्टी कर रहे हो। तो तुम लोग के चेहरे पर यह उदासी क्यों छाई है?
तभी मैंने राधा के पिता जी को देखा। वह गांव से आए हुए थे ।रमा ने मुझे बताया कि उन्होंने राधा का रिश्ता तय कर दिया है। वे इसी महीने उसकी शादी की दिन,तारीख भी पक्का कर चुके हैं ।
मुझसे भी पूछने की जरूरत नहीं समझी देवर जी ने।
उसके पिताजी ने कहां कि यह सब आदमियों का काम होता है। इस बारे में औरतों से सलाह नहीं ली जाती है। मुझे जो ठीक लगा, वह मैंने किया । वो तो लड़के वालों ने लड़की देखने की जिद नहीं की नहीं तो इसका साँवला रंग देखकर वैसे ही मना कर देते।वैसे भी लड़कियों की शादी समय से कर देनी चाहिए। मैं तो इसके पढ़ाई के पहले ही खिलाफ था।
आज उसने थोड़ा पढ़ लिख लिया तो शादी के नाम पर मुंह बना रही है ।अगर अनपढ़ होती तो चुपचाप शादी के लिए राजी हो जाती। उनकी बातों को सुनकर अंदर ही अंदर मेरा खून खौल रहा था लेकिन मैं उनके घर के मामले में कुछ बोल भी नहीं सकती थी। मैं थोड़ी देर बाद घर वापस आ गई।
क्रमशः
स्नेहलता पाण्डेय
नई दिल्ली

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